सेक्टर-9 अस्पताल को बचाने का आंदोलन किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के जनहित का आंदोलन बनता जा रहा है।
- सार्वजनिक अस्पताल की कहानी: बुजुर्गों की जुबानी
- संयुक्त ट्रेड यूनियनों का जनसंपर्क अभियान तेज, निजीकरण के खिलाफ बढ़ रहा जनसमर्थन। निजीकरण से बचाने का आंदोलन।
सूचनाजी न्यूज, भिलाई। संयुक्त ट्रेड यूनियनों द्वारा सेक्टर-9 अस्पताल को निजी हाथों में सौंपने के प्रस्ताव के विरोध में चलाए जा रहे जनसंपर्क अभियान के दौरान सेवानिवृत्त कर्मचारियों और उनके परिजनों से लगातार संवाद किया जा रहा है। अभियान के दौरान एक बुजुर्ग साथी ने भावुक होकर कहा, “सेवानिवृत्ति के समय जो राशि मिली थी, आज महंगाई के इस दौर में उसकी कीमत बहुत कम रह गई है। हमारा इलाज इसी अस्पताल के भरोसे चलता है। यदि अस्पताल निजी हाथों में चला गया और इलाज महंगा हो गया, तो हमारे लिए जीवनयापन ही कठिन हो जाएगा।” यह केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की चिंता है।
निजीकरण का असर केवल इलाज पर नहीं, हर सुविधा पर पड़ेगा
अस्पताल की कैंटीन में बैठे बुजुर्ग साथियों ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि आज जहां बहुत कम कीमत पर नाश्ता और भोजन उपलब्ध हो जाता है, वहीं कॉरपोरेट अस्पतालों में यही सुविधाएं कई गुना महंगी होती हैं। उनका कहना था कि निजी अस्पतालों की व्यवस्था लाभ कमाने पर आधारित होती है, इसलिए मरीज और उनके परिजन हर छोटी-बड़ी सुविधा के लिए अतिरिक्त भुगतान करने को मजबूर हो जाते हैं। यह बदलाव आम और मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए गंभीर आर्थिक बोझ बन जाएगा।
पार्किंग और दवाइयों में भी बढ़ेगा आर्थिक बोझ
बुजुर्ग साथियों ने बताया कि आज सेक्टर-9 अस्पताल में बेहद कम शुल्क पर वाहन पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है, जबकि अधिकांश निजी अस्पतालों में पार्किंग शुल्क भी भारी होता है। इसी तरह दवाइयों के मामले में भी बड़ा अंतर है। निजी अस्पतालों में मरीजों को प्रायः अस्पताल से जुड़ी फार्मेसी से महंगी ब्रांडेड दवाइयां खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है, जबकि सेक्टर-9 अस्पताल के बाहर उचित मूल्य पर जेनेरिक दवाइयां उपलब्ध हैं। निजीकरण के बाद इस व्यवस्था के बने रहने की कोई गारंटी नहीं है।
आज की सुविधा, कल की अनिश्चितता
यूनियन नेताओं ने कहा-यदि प्रबंधन यह आश्वासन देता भी है वर्तमान सुविधाएं जारी रहेंगी, तब भी अनुभव बताता है कि निजीकरण के बाद धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था बदल जाती है। पहले सुविधाएं सीमित होती हैं, फिर शुल्क बढ़ते हैं और अंततः आम लोगों की पहुंच से स्वास्थ्य सेवाएं दूर हो जाती हैं। इसलिए यह केवल वर्तमान का नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में स्थाई एवं सेवानिवृत्त कर्मियों और उनके परिवारों की स्वास्थ्य सुरक्षा का प्रश्न है।
अस्पताल बचाने की लड़ाई जनहित की लड़ाई है
संयुक्त ट्रेड यूनियनों ने कहा है कि सेक्टर-9 अस्पताल को बचाने का आंदोलन किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि हजारों स्थाई एवं सेवानिवृत्ति कर्मियों, उनके परिवारों और पूरे क्षेत्र के जनहित का आंदोलन है। अभियान के दौरान मिल रहे व्यापक जनसमर्थन से स्पष्ट है कि लोग अस्पताल के निजीकरण के संभावित दुष्परिणामों को समझ रहे हैं। यूनियनों ने सभी कर्मचारियों, पेंशनरों और नागरिकों से आह्वान किया है कि वे इस जनहित के संघर्ष में सक्रिय भागीदारी निभाएं और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए एकजुट होकर आवाज बुलंद करें।

