बीएसपी में हादसा रोकने सबकुछ किया, लेकिन रिजल्ट में फेल, बाहर हो रही बदनामी…अब ओए और यूनियन ने गिनाई खामियां, दिए बेहतर सुझाव

भिलाई स्टील प्लांट में हादसा रोकने 22 करोड़ खा गई कंसल्टेंसी एजेंसी, डेढ़ साल में 10 की मौत, डायरेक्टर इंचार्ज आज यूनियनों से लिया फीडबैक

सूचनाजी न्यूज, भिलाई। भिलाई स्टील प्लांट में डेढ़ साल में 10 मौत और दस दिनों के भीतर चार हादसों ने हर किसी को झकझोर दिया है। बीएसपी ने हादसों पर लगाम लगाने के लिए 22 करोड़ रुपए खर्च तक कर दिया। सेफ्टी ट्रेनिंग तक करा रहा है, लेकिन कहीं से कोई कामयाबी नहीं मिल रही है। डायरेक्टर इंचार्ज अनिर्बान दासगुप्ता ने ऑल यूनियन मीटिंग शुक्रवार सुबह बुलाई। बीएसपी आफिसर्स एसोसिएशन और यूनियनों से सुझाव लेने से पहले अपना दर्द बयां किया।

डायरेक्टर इंचार्ज ने बेबाकी से कहा कि प्रबंधन लगातार हर कोशिश करा है। कहीं से कोई कोताही नहीं बरती जा रही है। बावजूद, हादसे रुक नहीं है। रिजल्ट में फेल हो रहे हैं। बाहर बदनामी हाथ आ रही है। प्लांट बदनाम हो रहा है। प्लांटहित में कार्य करने के लिए हम सबको एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा। इसके बाद यूनियन पदाधिकारियों ने बारी-बारी से सुझाव दिए।

किसी ने सुपरवाइजर कैडर को बहाल करने तो किसी ने ब्लास्ट फर्नेस, हॉट शॉप और मिल एरिया में ठेका मजदूरों को ट्रेनिंग देने का सुझाव दिया। खास बात यह कि दोषारोपण के बजाय अपनी गलतियों को तलाश किया गया ताकि प्लांट को सुरक्षित किया जा सके। मान्यता प्राप्त यूनियन इंटक के अतिरिक्त महासचिव संजय साहू ने सुझाव दिया कि सेफ्टी का सामान बीएसपी खुद खरीदे और ठेकेदार से पैसा काट ले। कार्यस्थल का निरीक्षण अधिकारियों की टीम करते रहे। बीएसपी टेंडर पॉलिसी में बदलाव करे। एलपीपी में टेंडर प्रक्रिया को बंद किया जाए। साथ ही कर्मचारियों और ठेका मजदूरों के लिए ड्रेस कोड तैयार किया जाए ताकि कार्यस्थल पर एक माहौल बने।

भिलाई स्टील प्लांट हादसों का गढ़ चुका है। हर दिन कोई न कोई हादसा बेचैनी बढ़ा रहा है। मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है। पिछले दस दिनों के भीतर चार हादसों ने दिल्ली तक को झकझोर दिया है। हर कोई हैरान-ओ-परेशान है। डायरेक्टर इंचार्ज अनिर्बान दासगुप्ता भी तनाव में आ गए हैं। हादसों को रोकने के लिए सभी ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों को तलब कर लिया है। इस्पात भवन डायरेक्टर इंचार्ज सभागार में बैठक आयोजित की गई है। बीएसपी आफिसर्स एसाेसिएशन और ट्रेड यूनियन के प्रतिनिधि पहुंच चुके हैं।

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ओए अध्यक्ष एनके बंछोर बोले…प्रेस से पहले आपस में चर्चा करें

-हादसा दुखद है। जिम्मेदारी हम सबको लेनी है। चाहे कर्मचारी वर्ग हो या अधिकारी वर्ग। प्लांट हित में सोचना है। डीएसओ को पहले सुनना चाहिए। अब तक की परंपरा रही है कि इसे बाद में सुना जाता है।
-ट्रेनिंग प्रोग्राम, 12 घंटे तक की ड्यूटी से हर कोई परेशान है। अधिकारी ट्रांसफर के लिए भटकते हैं। इस पर ध्यान देना चाहिए। जो भी मीटिंग हो, उसका फालो किया जाए।
-सेफ्टी कमेटी बहुत जरूरी है। ओए और यूनियन घटना स्थल पर जाए और उसको सुझाव के रूप में लिया जाए। 62 साल पुराने प्लांट को हम सब चला रहे हैं। हमारे पास वह लोग हैं, जो मजबूत कर सकते हैं। बस, सोच बदलने की जरूरत है। मिलकर काम किया जाए, बेहतर रिजल्ट आएगा। ओए और यूनियन को हर काम में इंवाल्व करें। जहां भी हमारी जरूरत होगी, हम तैयार हैं।
-जो सुझाव है, उसे पहले प्रेस के बजाय आपस में चर्चा करें ताकि सुझाव पर बेहतर फैसले लिए जा सके।

बीएसपी वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष उज्ज्वल दत्ता ने दिए सुझाव:

-ठेका मजदूरों को कार्यस्थल पर ही ट्रेनिंग दी जाए। ठेका मजदूरों की ट्रेनिंग के नाम पर खानापूर्ति की जाती है। केस स्टडी में ये बातें सामने आ चुकी है। दो-चार दिन पहले आए मजदूर को खतरनाक कार्य में लगाने का खामिजाया हादसा होता है।
-ठेका मजदूरों के कार्यों का निरीक्षण नहीं किया जाता है। इस पर कार्य किया जए।
-ठेकेदार मजदूर को बदल देते हैं। खर्चा कम करने के लिए ठेकेदार इस तरह का खेल खेल रहा है। हर मजदूर की लिस्ट विभागीय अधिकारी को पता होना चाहिए ताकि पता चले कि कौन-कौन नया मजदूर है।
-लाश को लेकर राजनीति बीएसपी वर्कर्स यूनियन नहीं करता है। इस परंपरा को रोकने के लिए प्रबंधन पॉलिसी को बेहतर करे।
-ठेका मजदूरों का 10 लाख रुपए का ग्रुप इंश्योरेंस किया जाए।
-घायल ठेका मजदूरों के इलाज पर प्रबंधन ध्यान नहीं देता है। अस्पताल से आने के बाद मजदूर का दोबारा इलाज नहीं किया जाता है। सारी सुविधा बंद हो जाती है। गेट पास तक ले लिया जाता है।

इस्पात श्रमिक मंच के शेख महमूद ने दिए चार सुझाव:

-सुपरवाइजर कैडर को फिर से लागू किया जाए। जब तक इसे लागू नहीं करेंगे तब तक कोई फायदा नहीं होने वाला है। मीटिंग करने के बाद सुझावों को लागू कराने वाला कार्यस्थल पर कोई नहीं है। पहले सुपरवाइजर ही अमल कराता था। आज इसकी कमी है, जिसकी वजह से हादसे हो रहे हैं।
-रिवर्स ऑक्सन की वजह से स्किल वर्करों की कमी हो रही है। खेत में काम करने वालों को पकड़कर लाकर प्लांट में काम कराया जा रहा है। इसे तत्काल रोका जाए।
-ठेका मजदूरों को लगातार कई शिफ्टों में काम कराते हैं। इसे तत्काल बंद किया जाए।
-प्लांट में जटिल कार्य है। कठिन परिस्थितियों में काम करने वाले मजदूर रेस्ट रूम में आराम करते थे, आज रेस्ट रूम खत्म हो चुके हैं। अधिकारी उसे प्राथमिकता में ही नहीं मानते हैं। कैंटीन सभी बर्बाद हो चुके हैं। कोई व्यवस्था नहीं है। न पंखा है और न कूलर है। इसे सुधारें, फिर से एनर्जी आएगी। कैंटीन में खाना सस्ता होता था। चार्जमैन सस्ता नाश्ता होने से भरपेट सबको खिलाता था। इस पर ध्यान दिया जाए।

एससी-एसटी फेडरेशन बोला-प्रबंधन यूनियन-एसोसिएशन को काम दे…

एससी-एसटी फेडरेशन के चेयरमैन सुनील रामटेके ने प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच समन्वय बनाकर चलने की बात की। जब तक जमीनी स्तर पर काम नहीं किया जाएगा, तब तक कुछ नहीं होने वाला है। ठेका मजदूर और चार्जमैन आदि विषयों पर काम करने की जरूरत है। प्रबंधन हम एसोसिएशन और यूनियनों को काम दें ताकि कर्मचारियों के हित में काम हो।

बैठक में ईडी वर्क्स अंजनि कुमार, ईडी पीएंडए केके सिंह, बीएसपी आफिसर्स एसोसिएशन से अध्यक्ष एनके बंछोर, इंटक के अतिरिक्त महासचिव संजय साहू, पूरन वर्मा, बीएसपी वर्कर्स यूनियन से अध्यक्ष उज्ज्वल दत्ता, महासचिव खूबचंद्र वर्मा, बीएमएस के अध्यक्ष आईपी मिश्र, महासचिव रवि सिंह, सीटू अध्यक्ष सविता मालवीय, महासचिव एसपी डे, इस्पात श्रमिक मंच से राजेश अग्रवाल, शेख महमूद, एससी-एसटी फेडरेशन के चेयरमैन सुनील रामटेके, एटक से विनोद कुमार सोनी आदि मौजूद हैं।

सीटू अध्यक्ष एसपी डे ने उठाया मुद्दा…

-एसपी डे ने एक जून के हादसे का मुद्दा उठा। पूछा-उस दिन वहां की जिम्मेदारी किसकी थी, कौन मौके पर काम करा था। आग कैसे लगी, इसकी जानकारी कोई नहीं दे पा रहा है। एक सप्ताह से कोई बता नहीं पा रहा है।
-16 जून 2021 के धमाका जिक्र किया, जिसकी आवाज सेक्टर-7 तक सुनाई दी थी। एसएमएस-3 के बारे में प्रबंधन को पूरी सूची दी है। आउट सोर्स काम नहीं करता है।
-वाटर लॉगिंग की शिकायत है। मेटल में पानी जाने के बाद धमाका होता है। जहां आदमी को जाना मना है, लेकिन मैं वहां आराम से जाकर आता हूं। कोई देखने वाला नहीं है।
-शिकायत करने वालों को डाराया जाता है। यूआरएम के बंदे का जिक्र करते हुए कहा कि इस मामले को जिस तरह से हैंडल किया गया, वह बिल्कुल ठीक नहीं था। मैटर को हैंडल करने का तरीका बताया। ईडी वर्क्स तक का नाम लिया। इतना खर्चा करने के बाद भी हादसा होना दुखद है।
-फैक्ट्री रजिस्टर्ड नहीं है। इंटीग्रेटेड प्लांट है। इस पर काम नहीं करेंगे तो हादसे होते रहेंगे।

2018 गैस कांड के बाद पड़ी कंसल्टेंसी एजेंसी की जरूरत

इधर, सेल के अधिकारियों ने इस्पात मंत्रालय के फैसले पर ही सवाल उठा दिया है। साल 2018 में गैस कांड के बाद मंत्रालय के आदेश पर सेल ने एक कंसल्टेंसी एजेंसी को सेफ्टी पर काम करने की जिम्मेदारी दी। अधिकारियों का दावा है कि कंपनी ने इसके बदले 22 करोड़ का भुगतान किया है, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं मिल रहा है। पैसे की बर्बादी के सवाय कुछ भी नहीं हुआ। मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है।

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साल 2018 से अब तक दर्जनों कार्मिकों की मौत हादसों में हो चुकी है। स्टील मेल्टिंग शॉप में एक साल के भीतर पांचवीं मौत गुरुवार को हुई है। वहीं, बीएसपी में डेढ़ साल में दस मौत हो चुकी है। कंसल्टेंसी एजेंसी पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि कंसल्टेंसी एजेंसी ने एप बनाकर दिया है। ज्यादातर सिस्टम पर यह एप खुलता ही नहीं है। कहीं, खुलता है तो सही से काम नहीं करता। हैरानी की बात यह है कि अगर, किसी ने शिकायत की तो उस पर एक्शन नहीं लिया जाता। शिकायत के कॉलम पर कई बार डॉट डालकर शिकायत को बंद कर दिया जाता है। इस पर क्या हुआ, यह शिकायतकर्ता को पता ही नहीं चलता है।

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सेल के अधिकारियों को इस बात से नाराजगी है कि कंसल्टेंसी एजेंसी आखिर किस बात का पैसा ले रही है। एजेंसी पैसा लेती है और ड्यूटी बीएसपी के कार्मिकों की लगाई जाती है। बीसपी के कार्मिकों से ही काम कराया जाता है। सेफ्टी को लेकर जिस स्तर का काम होना चाहिए, आखिर में वह हुआ ही नहीं…। वहीं, कर्मचारियों और ट्रेड यूनियन नेताओं की मांग है कि इस मामले की जांच होनी चाहिए और 22 करोड़ खर्च होने के बाद आखिर कहां लापरवाही बरती जा रही है। दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

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