Diploma Engineers Shanti March: सड़क पर उतरे डिप्लोमा इंजीनियर्स का छलका दर्द, कहा-सेल प्रबंधन ने कभी नहीं समझा अपना, न दिया पदनाम और न ही कॅरियर ग्रोथ

बीएसपी, दुर्गापुर, बोकारो, राउरकेला और बर्नपुर के डिप्लोमा इंजीनियर्स इस्पात मंत्रालय के निर्देश को लागू कराने निकाला पैदल मार्च।

सूचनाजी न्यूज, भिलाई। जूनियर इंजीनियर पदनाम की मांग को लेकर डिप्लोमा इंजीनियर्स का शांति मार्च व विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है। भिलाई स्टील प्लांट, दुर्गापुर, बोकारो, राउरकेला और इस्को बर्नपुर के डिप्लोमा इंजीनियर्स सड़क पर उतर चुके हैं। इस्को बर्नपुर में शाम चार बजे से ही डिप्लोमा इंजीनियर्स टनल गेट के सामने जुट गए। हाथों में तख्तियां लिए नारेबाजी कर रहे।

वहीं, करीब दो किलोमीटर लंबे मार्च में शामिल होने वाले कर्मचारियों से डिप्लोमा इंजीनियर्स एसोसिएशन ने अपील की है कि शांति बनाकर रखेंगे। सरकारी संपत्ति या कार्य को किसी भी प्रकार से नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। जिला प्रशासन की ओर से जारी दिशा-निर्देश की कॉपी सोशल मीडिया के माध्यम से कर्मचारियों तक पहुंचाई गई है ताकि वे एक बार जरूर पढ़ लें। शांति मार्च में शामिल होने वाले कर्मचारियों से यह अपील की गई थी।

सेल के नाम सौंपा मांग पत्र के नाम दिया ज्ञापन

सैकड़ों बीएसपी डिप्लोमा इंजीनियर्स पैदल मार्च करते हुए बोरिया गेट से मुर्गा चौक आईआर गेट तक पहुंचे। सेल चेयरमैन को संबोधित मांग पत्र आइआर विभाग को सौंपा गया। इस्पात मंत्रालय के आदेश 37)/2016-SAIL-PC को जल्द से जल्द डिप्लोमा इंजीनियर्स के पक्ष में लागू करने की मांग की गई। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से डेब महासचिव अभिषेक सिंह, उपाध्यक्ष मोहम्मद रफी, शिव शंकर तिवारी, उषाकर चौधरी, घनश्याम साहू, नील पटेल, अभिषेक सिंह, उपमहासचिव सुदर्शन, के. गणेश, मनीष यादव, कोषाध्यक्ष रमेश कुमार, संगठन सचिव पवन साहू, जोनल सेक्रटरी सौरभ सुमन, दीपेश चुग, अजय तमुरिया, रवि अरसे, पुपुल नायक, परम हंश, अनुज, प्रमोद वर्मा, रंजन, शशि वर्मा, धर्मेंद्र दलाल, श्रीनिवास, निशांत, संतोष, काशीराम मांझी, अंचु कुमार, मुरली, शुरेश, मेटा जगदीश आदि सहित सैकड़ों कि संख्या में डिप्लोमा इंजीनियर्स उपस्थित थे।

जानिए सेल इकाइयों में कहां-क्या हुआ

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राउरकेला स्टील प्लांट: डिप्लोमा इंजीनियर्स फेडरेशन ऑफ इस्पात-डेफी के अध्यक्ष एवं राउरकेला इस्पत संयंत्र के कर्मचारी नरेंद्र नाथ दास के नेतृत्व में शांति पूर्वक प्रदर्शन किया जा रहा है। बिसरा चौक पर ही मानव श्रृंखला बनाई गई है। मेन गेट से बिसरा चौक की दूरी एक किलोमीटर है। वहीं सभी डिप्लोमा इंजीनियर्स जुटे हैं। इस्पात मंत्रालय द्वारा आदेश पारित होने के बाद भी अब तक अमल नहीं होने पर नाराजगी जताई जा रही है। स्लोगन लिखे तख्तियां कर्मचारी हाथों में लिए खड़े हैं।

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इस्को बर्नपुर स्टील प्लांट: डिप्लोमा इंजीनियर्स वेलफेयर एसोसिएशन बर्नपुर के महासचिव मनोज कुमार कर के नेतृत्व में प्रदर्शन शुरू हो गया है। डिप्लोमा इंजीनियर्स शाम चार बजे से ही कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गए। हाथों में तख्तियां लिए कर्मचारी कतार में लगते गए। कोई पानी पिलाता रहा तो कोई गर्मी से बचाव का इंतजाम करने में लगा रहा। कार्यक्रम के समापन के बाद एक प्रतिनिधिमंडल ईडी पीएंडए अनूप कुमार से मुलाकात करेगा। इस्पात मंत्रालय के आदेश पर अमल नहीं होने पर विरोध दर्ज कराया जाएगा। विरोध-प्रदर्शन में एलके मन्ना, मनोज बावरी, कुल्लन बारिक, जी. कुमार, ओरून मंडल मौजूद हैं। बर्नपुर के टनल गेट के सामने प्रदर्शन किया जाएगा। बता दें कि बर्नपुर में करीब 1100 डिप्लोमा इंजीनियर्स हैं।


बोकारो स्टील प्लांट: बोकारो इस्पात डिप्लोमाधारी कामगार यूनियन-बीआईडीयू के अध्यक्ष संदीप कुमार ने बताया कि कर्मचारी अपने हक के लिए सड़क पर उतर चुके हैं। बोकारो गांधी चौक से राजेंद्र चौक होते हुए वापस गांधी चौक पर शांति मार्च समाप्त होगा। करीब दो किलोमीटर लंबा शांति मार्च निकाला गया है।

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दुर्गापुर स्टील प्लांट: दुर्गापुर प्रशासनिक भवन के सामने प्रदर्शन किया जा रहा है। डिप्लोमा इंजीनियर्स प्रशासनिक पर शाम जुटे हुए हैं। हाथों में तख्तियां लिए पदनाम की मांग कर रहे हैं। इसके बाद यहां से फ्लाइओवर होते हुए मार्च निकाला जाएगा। दुर्गापुर स्टील प्लांट डिप्लोमा इंजीनियर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी नंद किशोर घोष बैराग्य
ने बताया कि करीब आधा किलोमीटर की दूरी तय की जाएगी।

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भिलाई स्टील प्लांट: बीएसपी डिप्लोमा इंजीनियर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष मोहम्मद रफी ने बताया कि बोरिया गेट से शांति मार्च निकाला गया है। मेन गेट होते हुए आइआर डिपार्टमेंट तक मार्च निकाला गया है। करीब दो किलोमीटर लंबा शांति मार्च निकाला गया। कर्मचारी हाथों में बैनर, पोस्टर लिए चल रहे थे।

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जूनियर के साथ वरिष्ठ डिप्लोमा इंजीनियर भी नाराज, सुपरवाइजर कैडर के न होने से नुकसान

-वरिष्ठ डिप्लोमा इंजीनियर्स का कहना है सेल मैनेजमेंट ने इस पढ़े-लिखे एवं समर्पित वर्ग के साथ हमेशा अन्याय किया है। चाहे वह पदनाम का मामला हो या ग्रोथ का। कभी इस वर्ग के लिए अच्छा नहीं हुआ।
-यहां सुपरवाइजर कैडर के ना होने से सीधा नुकसान संयंत्र व इस वर्ग का हुआ है। साथ ही वर्कर कैडर होते हुए भी यूनियनों का व्यवहार सहयोगपूर्ण नहीं रहा।
-उन्होंने कभी इस वर्ग को अपना नहीं समझा। इसीलिए ना तो कोई अच्छी प्रमोशन पॉलिसी बन पाई और ना ही कोई अच्छा पदनाम नहीं मिल पाया।
-2010 से 2018 तक ई-0 प्रमोशन नहीं हुआ। फिर भी किसी यूनियन ने कभी कोई आवाज नहीं उठाई। न ही इसके लिए कोई प्रदर्शन हुए। और प्रबंधन सब जानते हुए भी मूकदर्शक बना रहा।
-वर्षों पहले वर्कर में अधिकतम ग्रेड एस-8 हुआ करता था। डिप्लोमा योग्यता वालों का जॉइनिंग एस-6 में होती थी और वह जल्दी ही अधिकारी वर्ग में पदोन्नत हो जाते थे।
-इसलिए उस समय असंतोष नहीं होता था और न ही कोई इस योग्यता वाला यूनियन गतिविधियों में सक्रिय होता था। इसीलिए यूनियन के बड़े नेता भी गैर डिप्लोमा इंजीनियर ही रहे।

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पदनाम नॉन फाइनेंसियल है, पर रिजल्ट मिलेगा सकारात्मक

इस्पात मंत्रालय द्वारा सेल, आरआईएनएल के डिप्लोमा इंजीनियर्स के पदनाम व कॅरियर ग्रोथ के लिए बनाई गई उच्च स्तरीय कमेटी की अनुशंसाएं अब तक लागू नहीं हो सका है। इसे लागू कराने के लिए सेल इकाइयों के डिप्लोमा इंजीनियर्स ने शांति मार्च निकाला। डेफी अध्यक्ष नरेंद्रनाथ दास ने कहा कि डिप्लोमा इंजीनियर्स द्वारा जूनियर इंजीनियर पदनाम का आदेश मई 2017 में आने के बाद विगत पांच वर्षों में अलग अलग स्तर पर इसे लागू कराने प्रयास किए जा चुके है। अभी तक यह प्रयास जारी है। पदनाम का यह विषय भले ही नॉन फाइनेंसियल है, पर इससे संयंत्र के उत्पादन क्षमता व सुरक्षा पर इसका बड़ा सकारात्मक असर दिखेगा।

पहले से ज्यादा उत्तरदायित्व निभा रहे डिप्लोमा इंजीनियर्स-राजेश शर्मा

डेब अध्यक्ष राजेश शर्मा ने कहा कि सेल का डिप्लोमा इंजीनियर शायद पहला ऐसा वर्ग है, जो की बिना कंपनी पर अतिरिक्त भार डाले पहले से ज्यादा उत्तरदायित्व का निर्वहन करना चाहता है। पर, इसे विगत पांच सालों से क्यों लटकाया जा रहा है। यह किसी भी कर्मचारी के समझ से परे है।

प्राइवेट संयंत्र डिप्लोमा इंजीनियर्स स्किल उपयोगिता में सबसे आगे

-इस्पात क्षेत्र में कार्यरत सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी सेल,आरआईएनएल की अपेक्षा निजी संयंत्रों टाटा, जिंदल, आर्सेलर मित्तल डिप्लोमा इंजीनियर्स की योग्यताओं का बेहतर उपयोग करते हैं,जिससे उनका मैनपावर कॉस्ट सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से बेहतर होता है।
-अगर बात करें तो टाटा स्टील जमशेदपुर 10 एमटी प्लांट में कुल 13528 कर्मचारी हैं, जिसमे 3500 डिप्लोमा इंजीनियर्स एवं 1500 ऑफिसर है। वहीं, सेल बीएसपी की बात की जाए तो 7.5 एमटी प्लांट लगभग 17000 कर्मचारी है, जिसमे 3000 के लगभग डिप्लोमा इंजीनियर्स व 3310 ऑफिसर मिलकर संयंत्र चला रहे है।
-ऑफिसर ज्यादा रखने का प्रमुख कारण अधिकतर प्रबंधकों से सुपरवाइजर का कार्य लिया जाना है। जबकि एचआर एक्सपर्ट्स की मानें तो इस तरह के कार्यों को डिप्लोमा इंजीनियर द्वारा ही निष्पादन करवाना कंपनी के लिए फायदेमंद होता है।


-इसी तरह टाटा स्टील 2009 से ही अपनी एचआर पालिसी में बदलाव ला चुका है। डिप्लोमाधारियों को प्रारंभ से ही जूनियर इंजीनियर ग्रेड-1 के पद पर बहाली देता है।
-जेई ग्रेड-1 की भूमिका प्लांट में कार्य को बेहतर संचालन के लिए नेतृत्व की गुणवत्ता और सुधार गतिविधि में भागीदारी की आवश्यकता को सुनिश्चित करना है, ताकि उत्कृष्ट परिचालन परिणाम प्राप्त किया जा सके, जो संयंत्र और उपकरणों के संचालन और रखरखाव में चुनौतीपूर्ण कार्य के साथ महत्वपूर्ण स्थिति भी है।

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