वार्ड आरक्षण ने बदली कांग्रेस-भाजपा के दिग्गज पार्षदों की चुनावी रणनीति। किसी को घर वापसी की उम्मीद तो किसी को नया सियासी ठिकाना।
- आरक्षण ने उखाड़ दिए सियासी गढ़:
- पुराना गढ़ छूटा, नया ठिकाना तलाश रहे पार्षद।
अज़मत अली, भिलाई। भिलाई नगर निगम के वार्ड आरक्षण ने शहर की सियासत का पूरा गणित बदल दिया है। वर्षों से जिस वार्ड को अपना सियासी गढ़ बनाकर नेताओं ने पहचान बनाई, वही सीट आरक्षण की वजह से हाथ से निकल गई। अब कांग्रेस और भाजपा के कई चर्चित पार्षदों को नए वार्ड से चुनावी ताल ठोंकने की तैयारी करनी पड़ रही है।
आरक्षण के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि कौन नेता कहां से चुनाव लड़ेगा? किसे पुराने इलाके में घर वापसी का मौका मिलेगा और किसे नए क्षेत्र में अपनी सियासी जमीन तैयार करनी होगी? भिलाई के चर्चित पार्षदों के संभावित नए ठिकानों और चुनावी रणनीति पर सूचनाजी.कॉम ने पड़ताल की है।
वार्ड आरक्षण के बाद भिलाई की राजनीति में अब पुराने समीकरणों की जगह नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं। कौन नेता किस वार्ड से मैदान में उतरेगा, इसका अंतिम फैसला राजनीतिक दलों की टिकट घोषणा के बाद ही होगा। लेकिन आरक्षण ने दिग्गज पार्षदों के लिए चुनावी रणनीति की नई पटकथा जरूर लिख दी है।
लक्ष्मीपति राजू की फिर होगी सेक्टर-7 में घर वापसी
कांग्रेस के दिग्गज पार्षद लक्ष्मीपति राजू वर्तमान में वार्ड 66 सेक्टर-7 पूर्व से पार्षद हैं। आरक्षण में यह वार्ड महिला के लिए आरक्षित हो गया है। ऐसे में उनकी नजर अब सेक्टर-7 पश्चिम के सामान्य वार्ड पर है।
लक्ष्मीपति राजू का इस इलाके से पुराना जुड़ाव रहा है। वर्ष 2005 में उन्होंने पहली बार निगम चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी। अब तक वे इन्हीं क्षेत्रों से चुनाव लड़ते आए हैं। पांचवीं बार चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी के बीच सेक्टर-7 पश्चिम उनके लिए स्वाभाविक विकल्प माना जा रहा है।
आदित्य सिंह की नजर कैंप एरिया पर
वार्ड 7 राधिकानगर से कांग्रेस के पार्षद आदित्य सिंह की सीट भी महिला के लिए आरक्षित हो गई है। ऐसे में उन्हें नया वार्ड तलाशना होगा। जुनवानी से कोहका और आसपास के कई वार्ड आरक्षण की जद में आने के बाद कैंप क्षेत्र की ओर उनकी नजर बताई जा रही है।
आदित्य सिंह कैंप-1 में बीएसपी आवास में रहकर पढ़े-बढ़े हैं। पढ़ाई से लेकर शादी तक उनका जुड़ाव कैंप क्षेत्र से रहा है। वर्ष 2021 में वे राधिकानगर पहुंचे। ऐसे में उनकी पहली पसंद अपने पुराने इलाके में वापसी हो सकती है। कैंप क्षेत्र से टिकट की दावेदारी की चर्चा भी है।
आदित्य सिंह की सियासी पारी छात्र राजनीति से शुरू हुई। वर्ष 2006 से सक्रिय राजनीति में कदम रखने के बाद वे एनएसयूआई से जुड़े। अजीत जोगी के नेतृत्व में विधानसभा घेराव जैसे आंदोलनों में भी शामिल रहे। बाद में विधायक देवेंद्र यादव के संपर्क में आए और कांग्रेस की स्थानीय राजनीति में अपनी जगह मजबूत की। वे साईं महाविद्यालय के कॉलेज अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
पीयूष मिश्र की हाउसिंग बोर्ड में ‘घर वापसी’
भाजपा पार्षद पीयूष मिश्र का वर्तमान वार्ड भी महिला के लिए आरक्षित हो गया है। ऐसे में उनकी नजर एक बार फिर हाउसिंग बोर्ड पर है। सामान्य वार्ड होने की वजह से यहां से उनकी दावेदारी मजबूत मानी जा रही है।
पीयूष मिश्र हाउसिंग बोर्ड क्षेत्र से लगातार दो बार पार्षद रह चुके हैं। पिछली बार आरक्षण के समीकरण के चलते उन्हें खुर्सीपार के वार्ड 38 से चुनाव लड़ना पड़ा था और उन्होंने वहां भी जीत दर्ज की।
हाउसिंग बोर्ड के पुराने वार्ड 16 और 26 से चुनाव लड़ने का उनका अनुभव है। क्षेत्र में उनका आवास और पुराना राजनीतिक संपर्क भी है। ऐसे में आरक्षण बदलने के बाद हाउसिंग बोर्ड उनके लिए फिर से मजबूत चुनावी ठिकाना बनता दिख रहा है।
सीजू एंथोनी की नजर सेक्टर-10 पर
चार बार के कांग्रेस पार्षद सीजू एंथोनी अब हुडको से निकलकर सेक्टर-10 की ओर रुख कर सकते हैं। हुडको का वार्ड महिला के लिए आरक्षित होने के बाद उनके सामने नया वार्ड चुनने की चुनौती है।
सीजू एंथोनी का सेक्टर-10 से पुराना जुड़ाव रहा है। यहां उनका ठिकाना रहा है और इलाके में व्यक्तिगत संपर्क भी मजबूत माना जाता है। यही वजह है कि सेक्टर-10 के सामान्य वार्ड से चुनाव लड़ने की उनकी दावेदारी चर्चा में है।
इंजीनियर और बीएसपी ठेकेदार सीजू एंथोनी हुडको के दो अलग-अलग वार्डों से चुनाव लड़ चुके हैं और चार बार जीत हासिल कर चुके हैं। अब पांचवीं बार चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी है।
उनका राजनीतिक सफर यूथ कांग्रेस से शुरू हुआ। प्रदेश कांग्रेस कमेटी में विभिन्न जिम्मेदारियां संभालने के अलावा वे नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष और कार्यवाहक मेयर की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं।
सेक्टर-10 के सामान्य वार्ड से वर्तमान पार्षद अभय सोनी के इस बार चुनाव नहीं लड़ने की चर्चा है। यदि ऐसा हुआ तो सीजू एंथोनी के लिए यहां से दावेदारी का रास्ता अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। हालांकि अंतिम फैसला पार्टी को ही करना है।
शास्त्रीनगर से दया सिंह पर भाजपा खेलेगी दांव?
भाजपा के पार्षद दया सिंह के वार्ड का आरक्षण बदलने के बाद उनके सामने भी नया सियासी ठिकाना तलाशने की चुनौती है। वार्ड 44 महिला के लिए आरक्षित होने से अब उन्हें दूसरे सामान्य वार्ड से दावेदारी करनी होगी।
न्यू खुर्सीपार में रहने वाले दया सिंह का कार्यालय वार्ड 50 शास्त्रीनगर-खुर्सीपार में है। इस क्षेत्र से उनके पुराने संपर्क को देखते हुए समर्थकों ने शास्त्रीनगर से उनकी दावेदारी शुरू कर दी है।
दया सिंह ने सूचनाजी.कॉम से बातचीत में कहा कि शास्त्रीनगर में उनका कार्यालय करीब 25 वर्षों से है। वहां के लोग भी चुनाव लड़ने की मांग कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने साफ किया कि अंतिम फैसला पार्टी का होगा।
उन्होंने कहा, “पार्टी जो तय करेगी, वही होगा। पार्टी की इच्छा होगी तो टिकट मिलेगा। पार्टी टिकट नहीं देगी तो चुनावी मैदान में नहीं उतरूंगा। मेरे लिए पार्टी की आज्ञा सबसे ऊपर है।”

