भिलाई इस्पात संयंत्र में काम करके घर लौटे कर्मचारियों, अधिकारियों का अंधेरे से सामना। नगर सेवाएं विभाग की ढिलाई पर गुस्सा।
सूचनाजी न्यूज, भिलाई। भिलाई टाउनशिप के सेक्टर-5 के एक बड़े हिस्से में बिजली गुल होने की घटना ने एक बार फिर कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। दिन भर संयंत्र में उत्पादन और मेंटेनेंस की जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाले कर्मचारी जब 8 से 12 घंटे की ड्यूटी पूरी कर घर लौटते हैं, तो उनकी अपेक्षा केवल इतनी होती है कि उन्हें कुछ घंटे आराम और सामान्य सुविधाएं मिल जाएं। लेकिन जब घर पहुंचकर पता चले कि दोपहर से बिजली ही नहीं है, तो थकान के साथ-साथ व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न भी खड़े होने लगते हैं। दोपहर से बिजली गुल है। रात करीब साढ़े 10 बजे ट्रांसफर की व्यवस्था की गई।
तेज आंधी के समय ट्रांसफार्मर उड़ा और व्यवस्था चलती रही पैदल
जानकारी के अनुसार ट्रांसफार्मर खराब होने के कारण आपूर्ति बाधित हुई। समस्या तकनीकी थी, लेकिन समाधान की प्रक्रिया ने लोगों को अधिक परेशान किया। बताया जा रहा है कि ट्रांसफार्मर बदलने का कार्य ठेके पर निर्भर है। यानी पहले वाहन की व्यवस्था हो, फिर उपकरण जुटें, कर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित हो, उसके बाद विभाग से ट्रांसफार्मर प्राप्त किया जाए और अंततः उसे स्थापित कर आपूर्ति बहाल की जाए। तब तक नागरिकों और कर्मचारियों के हिस्से में इंतजार, उमस और अंधेरा ही आता है।
मोबाइल हमेशा ऑन, जवाबदेही कभी-कभी ऑफ, फोन की घंटी बजती रही, जवाबदेही सोती रही
विडंबना यह भी है कि संयंत्र के अधिकारी और कर्मचारी अनेक बार चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने की अपेक्षा के साथ कार्य करते हैं। उत्पादन, सुरक्षा और आपातकालीन परिस्थितियों में मोबाइल फोन उनकी जेब का स्थायी उपकरण बन चुका है। दूसरी ओर जब टाउनशिप की समस्या सामने आती है, तो कई बार शिकायत करने वालों को फोन तक न उठने की शिकायत रहती है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि चौबीसों घंटे की जवाबदेही का सिद्धांत आखिर किस सीमा तक लागू है।
जीरो टॉलरेंस की रोशनी, अंधेरे में खोजता कर्मचारी
सुरक्षा और जीरो टॉलरेंस की चर्चा अक्सर बड़े मंचों पर सुनाई देती है। लेकिन सुरक्षा केवल हेलमेट, दस्ताने और नियम पुस्तिकाओं से नहीं बनती। पर्याप्त विश्राम, मानसिक शांति और घरेलू सुविधाएं भी सुरक्षित कार्य संस्कृति का हिस्सा हैं। यदि कर्मचारी रात भर गर्मी और अंधेरे में करवटें बदलते रहें, तो अगली सुबह उनका शरीर और मन दोनों प्रभावित होंगे।
ऐसे में संयंत्र की कार्यक्षमता, सतर्कता और सुरक्षा पर भी असर पड़ना स्वाभाविक है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि बिजली बहाली की प्रक्रिया रात में पूरी होती है या फिर यह घटना भी उन घटनाओं की सूची में शामिल हो जाती है, जिन पर अगले दिन केवल इतना कहा जाता है—“रात गई, बात गई।”



