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BSP इस्पात भवन घेराव: क्या पंडित नेहरू के भिलाई को बचाने की आखिरी लड़ाई, अभी नहीं तो कभी नहीं…

Azmat ali 08/08/2026 1 minute read
Ispat Bhawan Gherav Is this the Final Battle to Save Pandit Nehru Bhilai-Now or Never

बीएसपी इस्पात भवन घेराव क्यों जरूरी। प्रदर्शनकारियों ने कहा-पॉलिसी पर अमल यहीं से होता है। संयंत्र के मुखिया यहीं बैठते हैं।

  • रिटेंशनधारी-लाइसेंसधारियों के समर्थन में भिलाई इस्पात संयंत्र के इस्पात भवन का घेराव।

सूचनाजी न्यूज, भिलाई। भिलाई सत्याग्रह। रिटेंशन और लाइसेंसधारियों से मकान खाली कराने के नोटिस ने आग में घी डाल दिया है। हजारों परिवारों के साथ संकट खड़ा हो गया है। भिलाई स्टील प्लांट में सवा दे चुके कर्मचारियों और अधिकारियों और शहरवासियों की आवाज को उठाने के लिए इस्पात भवन घेराव शनिवार शाम को है। विधायक देवेंद्र यादव भी खुलकर सामने आ गए हैं। उनका कहना है कि भिलाई बचाने की आखिरी लड़ाई लड़ी जा रही है। अभी नहीं तो कभी नहीं…। शहरवासी खुलकर सामने आएं और सेल प्रबंधन को नोटिस वापस लेने पर मजबूर करें।

विधायक देवेंद्र यादव ने कहा-नेहरू जी के सपनों का शहर और भारत का पहला इस्पात संयंत्र भिलाई इस्पात संयंत्र 1960 के दशक में शुरू हुआ, जहां संयंत्र के साथ-साथ एक बहुत बड़ा टाउनशिप बना। उस टाउनशिप में 60 से ज्यादा स्कूल बने। लगभग हर सेक्टर में हेल्थ सेंटर बने और एक बड़ा अस्पताल बना। उस शहर में वहां की सपोर्टिंग पापुलेशन के लिए सभी राष्ट्रीयकृत बैंकों को एक जगह सिविक सेंटर में बनाया गया। फिर उन बैंक कर्मचारियों का रहने के लिए बैंक कॉलोनी।

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इसी तरह से हर सेक्टर में पोस्ट ऑफिस बने और वहां काम करने वाले कर्मचारियों के लिए पोस्ट ऑफिस कॉलोनी सेक्टर 6 में बनी। फिर भिलाई शहर में रहने वालों की सुरक्षा के लिए पुलिस थाने बने। पुलिस कर्मियों के रहने के लिए पुलिस कॉलोनी बनी। कुल मिलाकर एक छोटा मिनी भारत भिलाई में बसाया गया और वह शहर भारत के पहले व्यवस्थित बसाहट शहरों में से एक था, जो लगभग लगभग भारत के हर प्रांत से आकर यहां लोग बसे। लेकिन धीरे-धीरे समय बदलता रहा। सरकारों की सोच बदलती रही और सरकारे बदलती रही।

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दुनिया बाजार बना और उस बाजार में आपके संयंत्र को भी ले जाकर बैठाया गया। जहां पर आपकी योग्यता का मापदंड सिर्फ और सिर्फ लाभ कमाना था। लेकिन इन सब के बाद भी आपके स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त करने लगे। आपके अस्पताल में इलाज कराने के लिए पूरे मध्य भारत से लोग आने लगे। लेकिन धीरे-धीरे सरकारी उपक्रमों के प्रति सरकारों का नजरिया बदलने लगा और कहा जाने लगा आपका काम सिर्फ लोहा बनाना है।

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टाउनशिप चलाना, हॉस्पिटल चलाना, एजुकेशन चलाना आपका काम नहीं है। और इसी विचार ने आज टाउनशिप की स्थिति धीरे-धीरे उस नेहरू के सपनों के शहर को खंडहर में तब्दील किया जाने लगा। दूसरी तरफ जहां संयंत्र में 60000 रेगुलर कर्मचारी काम करते थे, उनकी संख्या घटते धीरे-धीरे आज अधिकारी एवं कर्मचारी मात्र 13000 रह गए हैं। और तो और उनकी जगह उच्च शिक्षित ठेका मजदूर लेने लगे। लेकिन जहां मुनाफा की बात आती है तो बहुत सारी चीजे ताख पर रखी जाती रही है और उसमें ठेका मजदूरों का शोषण और सुरक्षा की अनदेखी। जिसका परिणाम लगातार हो रही दुर्घटनाएं हैं।

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मूल विषय पर आते हैं। आज टाउनशिप को बचाना कैसे है? अस्पताल को बचाना कैसे है? लेकिन सरकार की वह नीति जो सतह पर आ चुकी है और वह है लैंड मोनेटाइजेशन स्कीम। बाकायदा इसके लिए केंद्र सरकार ने कंपनी बना रखी है और उसे कंपनी का काम है सार्वजनिक उद्योगों की अतिरिक्त पड़ी हुई जमीन का कैसे व्यावसायिक उपयोग किया जाए, जिसमें बेचकर लीज में देकर या अन्य तरीके से उसे जमीन पर अतिरिक्त आय कैसे लिया जाए और यही से शुरू होता है टाउनशिप को खाली करने का खेल।

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एक समय 60000 एंप्लॉई के लिए बनाया गया टाउनशिप जहां आज मात्र 13000 कर्मचारी और अधिकारी है और उनमें से ज्यादातर लोग टाउनशिप के क्वार्टरों की जर्जर स्थिति को देखते हुए धीरे-धीरे अपने स्वयं के मकान में जाने लगे। उस स्थिति में कुछ ही एम्पलाई बचे हैं, जो टाउनशिप में रह रहे हैं। इसका फायदा उठाकर प्रबंधन टाउनशिप को खाली करने की मुहिम तेज कर दी है और जितने भी लाइसेंस और रिटेंशन में बीएसपी ने क्वार्टर दिए थे, उन सभी को खाली करने का फरमान या नोटिस जारी कर दिया है।

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इस्पात भवन घेराव कार्यक्रम का संयोजन कर रहे छत्तीसगढ़ यूथ कांग्रेस के महासचिव जुल्फिकार सिद्दीकी ने कहा-भिलाई को बचाने का आंदोलन है। इस आंदोलन में प्रभावित टाउनशिप के लोग भागीदारी करेंगे। बस कहना यही है कि कल को यह मत कहना मैंने आपको जगाया नहीं…। अभी नहीं तो कभी नहीं…।

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