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SAIL NEWS: आधा-अधूरा वेतन समझौता, 40% मजदूरों की छंटनी, केन्द्र सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों पर तपन सेन बोकारो में भड़के

Azmat ali 16/07/2026 1 minute read
Tapan Sen Speaks in Bokaro on the SAIL Wage Agreement Retrenchment Central Government Anti-Worker Policies

ठेका श्रमिकों के नियमितीकरण, स्थायी कार्यों में ठेका प्रथा समाप्त करने, समान काम के लिए समान वेतन, बोनस, ग्रेच्युटी, पेंशन पर चर्चा हुई।

  • फिक्स्ड टर्म रोजगार को सामान्य बनाया जा रहा है, मौजूदा सामाजिक सुरक्षा कानूनों को कमजोर किया जा रहा है।

सूचनाजी न्यूज, बोकारो। सेल कर्मचारियों के आधे-अधूरे वेतन समझौते और 40 प्रतिशत ठेका मजदूरों की छंटनी के खिलाफ सीटू के केंद्रीय नेता व पूर्व सांसद तपन सेन बोकारो पहुंचे। मजदूरों को संबोधित करते हुए सीटू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तपन सेन ने कहा कि ट्रेड यूनियनें लगातार श्रम-विरोधी, नियोक्ता-समर्थक श्रम संहिताओं का विरोध करती रही हैं, जिन्हें तथाकथित ‘श्रम सुधार’ और “इज आफ डूइंग बिजनेस” के नाम पर लाया गया है। 12 फरवरी की ऐतिहासिक आम हड़ताल के बाद भी केंद्र सरकार इन श्रम संहिताओं को वापस लेने या इस मुद्दे पर केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ कोई सार्थक बैठक करने से बच रही है।

इसके अलावा, इन संहिताओं के मसौदा तैयार करने के चरण से ही ट्रेड यूनियनों जैसे हितधारकों से कोई परामर्श नहीं किया गया। इतने गंभीर मुद्दे पर, जो देश के कार्यबल के जीवन से जुड़ा है, लंबे समय से भारतीय श्रम सम्मेलन भी नहीं बुलाया गया। यह अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का उल्लंघन है, जिनके प्रति भारत एक राष्ट्र के रूप में प्रतिबद्ध है।

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उन्होंने आगे कहा कि श्रम संहिताएँ देश के श्रमिकों जो संपत्ति के वास्तविक सृजनकर्ता हैं को फिर से ब्रिटिश औपनिवेशिक काल जैसी शोषणकारी परिस्थितियों में धकेलने का प्रयास हैं। श्रमिक वर्ग ने औपनिवेशिक काल में अत्यधिक शोषण के खिलाफ और स्वतंत्र भारत में भी 8 घंटे के कार्यदिवस, कार्यस्थल सुरक्षा, यूनियन बनाने और संगठित होने के अधिकार, सामूहिक सौदेबाजी, आंदोलन करने और हड़ताल के अधिकार के लिए संघर्ष किया है। उन्होंने सम्मानजनक वेतन, सामाजिक सुरक्षा, ठेका श्रमिकों के नियमितीकरण, स्थायी कार्यों में ठेका प्रथा समाप्त करने, समान काम के लिए समान वेतन, बोनस, ग्रेच्युटी और पेंशन के अधिकार के लिए भी लड़ाई लड़ी है।

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तपन सेन ने कहा-हमने 1926 के ट्रेड यूनियन अधिनियम के माध्यम से यूनियन बनाने के अधिकार को वैधानिक मान्यता दिलाई। ब्रिटिश काल में हमारे पूर्वजों के संधर्ष से कई श्रम कानून बने, और स्वतंत्र भारत में संसद द्वारा कुल 44 केंद्रीय श्रम कानून तथा राज्यों द्वारा लगभग 150 कानून बनाए गए, क्योंकि श्रम भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में शामिल है। ये सभी उपलब्धियों लगभग 150 वर्षों के संघर्ष का परिणाम हैं।

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उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान केंद्र सरकार इन श्रम संहिताओं के माध्यम से इन उपलब्धियों को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इन संहिताओं में ऐसे कठोर और दमनकारी प्रावधान हैं, जिनसे यूनियन बनाना कठिन, पंजीकरण मुश्किल और निरस्तीकरण आसान हो जाएगा। नियोक्ताओं के उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जा रहा है, जबकि ट्रेड यूनियन गतिविधियों को दंडनीय बनाया जा रहा है। कार्य समय की सीमा को खुला छोड़ दिया गया है, जिससे उसे मनमाने ढंग से बढ़ाया जा सके। हड़ताल का अधिकार लगभग समाप्त कर दिया गया है।

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फिक्स्ड टर्म रोजगार को सामान्य बनाया जा रहा है, मौजूदा सामाजिक सुरक्षा कानूनों को कमजोर किया जा रहा है और सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा के झूठे दावे के बावजूद अधिक श्रमिकों को इसके दायरे से बाहर रखा जा रहा है। सुरक्षा मानकों से समझौता किया जा रहा है और 17 क्षेत्रीय श्रम कानूनों को समाप्त कर बड़ी संख्या में श्रमिकों को व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार से वंचित किया जा रहा है।

उन्होंने आगे कहा कि न्यूनतम वेतन कानूनों को कमजोर कर गरीबी रेखा से नीचे ‘राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन’ लागू करने की कोशिश की जा रही है। ये संहिताएँ संगठित क्षेत्र को असंगठित बनाने और असंगठित श्रमिकों को अधिकारों से वंचित करने की दिशा में हैं। इनमें कई प्रावधान भारतीय संविधान की भावना, अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों और मानवाधिकारों के विरुद्ध हैं।

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उन्होंने आगे कहा कि ऐसी स्थिति में ट्रेड यूनियनों और श्रमिक संगठनों के पास इन श्रम संहिताओं के खिलाफ संघर्ष जारी रखने और उनके क्रियान्वयन के खिलाफ प्रतिरोध खड़ा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
यूनियन के महामंत्री आरके गोरांई ने एक स्वर में सेल प्रबंधन को बकाया वेतन समझौता अविलंब पूरा करने और ठीका मजदूरों को 40% छंटनी के फरमान को अविलंब वापस लेने की मांग की। आम बैठक की अध्यक्षता बी डी प्रसाद ने किया।

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