जो पैसा EPFO/सरकार के पास जमा है, वो लौटा दिया जाए,ताकि उसी पैसे से चाय,पान पकौड़े की दुकान से अपना जीवन यापन कर सकें।
- 10 सालों से न्यूनतम पेंशन 7500+महंगाई भत्ता प्रदान करने की मांग पर चले आ रहे देशव्यापी आंदोलनों का रिजल्ट शून्य।
सूचनाजी न्यूज, रायपुर। देशभर में आंदोलनों की कमी नहीं है। किसानों ने संघर्ष किया। मोदी सरकार ने कानून वापस ले लिया। छात्र सड़क पर उतरे। जंतर-मंतर पर लाठी खाई। देशभर में आक्रोशित युवाओं ने अपना नया अंदाज दिया। आधी रात को पीएम को वीडियो संदेश देना पड़ा। युवाओं के आगे सरकार झुकी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा देना बेहतर समझा। सरकार के खिलाफ बना आक्रोश शांत हो गया।
वहीं, देश के करीब 70 लाख से ज्यादा पेंशनभोगियों का आंदोलन कई सालों से चल रहा है। पीएम मोदी से भेंट-मुलाकात हो चुकी, लेकिन ईपीएस 95 न्यूनतम पेंशन बढ़ाने पर कोई फैसला नहीं हुआ। करीब 1 से 2 हजार रुपए के बीच ज्यादातर पेंशनर्स को न्यूनतम पेंशन मिल रही है। इस पेंशन को 7500 रुपए हर माह करने की मांग हो रही है। कई बार जंतर-मंतर पर पेंशनर्स बैठ चुके। सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। युवाओं के आंदोलन का रिजल्ट देख पेंशनभोगी भी अब सोच का तरीका बदलने का मन बना रहे हैं।
कर्मचारी पेंशन योजना के तहत ईपीएस 95 न्यूनतम पेंशन के लिए चल रहे आंदोलन के सदस्य अनिल कुमार नामदेव कहते हैं कि पिछले 10 सालों से न्यूनतम पेंशन 7500+महंगाई भत्ता प्रदान करने की मांग पर चले आ रहे देशव्यापी आंदोलनों पर भाँति-भांति की प्रतिक्रियाओं से सबको अवगत कराते रहा हूँ। पेंशन मिलना न मिलना,खुदा की मर्जी…जो शायद हम सब से अभी रूठा हुआ है। जबकि हमने सुन रखा है कि”हिम्मत-ए-मर्द, मदद-ए-खुदा” और शायद खुदा भी हमारी हिम्मतों की परीक्षा लेना चाहता है। पर कुछ और भी हैं, नंगे जो खुदा से भी बड़े हैं…। यही हमारी सबसे बड़ी विडंबना ही है।
दूसरी ओर हायर पेंशन का मसला है, जिस पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला 2016 और 2022 को जारी कर दिया था,उस पर भी देश के अधिकांश सेवानिवृत्त आज भी अपने आप को कानूनी दावं पेंच के चलते असहाय महसूस कर रहे हैं। लगता है हम सभी की परिणिती यही है कि सड़क पर हो या कोर्ट में लड़ते-लड़ते मर जाओ और वो हो भी रहा है। अब तो दोनों मोर्चों पर इस बात की लड़ाई होनी चाहिए कि हमें किसी की दया धर्म,मेहरबानी की जरूरत नहीं हैं।
हमारे जो पैसा EPFO/सरकार के पास जमा है, वो लौटा दिया जाए,ताकि उसी पैसे से हम चाय,पान पकौड़े की दुकान से अपना जीवन यापन कर सकें। इससे होने वाली कमाई आज दी जाने वाली पेंशन से कहीं बेहतर है और तथाकथित हमारी सेवानिवृत्त काल को संवारने वाली दुकान रूपी संस्था को बंद कर दिया जाए। ये कैसा प्रजातंत्र है जो हमारा ही अभिशाप साबित हो रही है। बहुत कुछ कहा और सुना जा चुका है अब तक। कुछ बाकी नहीं रहा कहने सुनने को, सिवाय इसके कि हमारे धैर्य की परीक्षा लेना बंद हो…।
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