24 सितंबर को बर्नपुर में यूनियन मान्यता चुनाव होने जा रहा है। चुनाव नजदीक आने के साथ-साथ घमासान तेज हो गया है।
सूचनाजी न्यूज, बर्नपुर। चुनाव आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन ट्रेड यूनियन का चरित्र, संघर्ष और मजदूरों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता वर्षों तक याद रहती है। 24 सितंबर को बर्नपुर में यूनियन मान्यता चुनाव होने जा रहा है। चुनाव नजदीक आने के साथ-साथ घमासान तेज हो गया है। सीटू ने इंटक एवं बीएमसी के चुनावी जुमलो और नारों पर हमलावर होते हुए मजदूरों से अपील किया कि मतदान से पहले यह जरूरी है कि हम इनके नारों और चुनावी वादों के बजाय पिछले फैसलों और उनके परिणामों को देखें और निर्णय लें।
30 जून की ऐतिहासिक हड़ताल से कौन पीछे हटा?
30 जून 2021 को सेल सहित स्टील क्षेत्र में वेतन समझौते को लेकर देशव्यापी हड़ताल हुई थी। उस समय वेतन समझौता जनवरी 2017 से लंबित था। हड़ताल नजदीक आते ही INTUC ने हड़ताल से एक दिन पहले अलग रहने का निर्णय लिया था, जबकि अन्य यूनियनें हड़ताल में शामिल हुई थीं।
सवाल सीधा है कि जब निर्णायक संघर्ष का समय आया तो कौन मैदान में था और कौन पीछे हट गया? आज वही लोग मजदूरों के बीच संघर्ष की बातें करते हैं। मजदूरों को तय करना होगा कि संघर्ष के समय साथ खड़ा होना महत्वपूर्ण है या चुनाव के समय संघर्ष का दावा करना?
बहुमत के नाम पर 13% MGB और 26.5% पर्क्स, जिम्मेदारी किसकी?
सेल आइएसपी सीटू का कहना है कि 21-22 अक्टूबर 2021 के NJCS घटनाक्रम में INTUC, HMS और AITUC ने 10 वर्ष की अवधि, 13% MGB और 26.5% पर्क्स वाले समझौते पर सहमति दी, इसमें 10 वर्ष की अवधि, 13% MGB पर अपनी सहमति देते हुए BMS भी बहुमत के खेल में शामिल हुआ था। सीटू का सवाल है कि जिस बहुमत के आधार पर यह फैसला हुआ, उस फैसले की जिम्मेदारी भी उसी बहुमत को स्वीकार करनी चाहिए।
पाँच वर्ष की परंपरा के स्थान पर दस वर्ष की अवधि स्वीकार करना मजदूरों के लिए दूरगामी परिणाम वाला निर्णय था। आज जब कर्मचारी इसके प्रभावों पर सवाल उठा रहे हैं तो जिम्मेदारी से बचने के बजाय उस समय लिए गए फैसले का जवाब देना चाहिए।
बोनस फॉर्मूला से लेकर 39 महीने के एरियर्स तक मजदूर भुगत रहा है खामियाजा
यूनियन नेताओं ने कहा-मजदूरों के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल प्रतिशत का नहीं, बल्कि पूरे वेतन समझौते के परिणाम का है। MGB, पर्क्स, बोनस फॉर्मूला और अन्य शर्तों पर लिए गए फैसलों का असर आज कर्मचारियों की जेब पर दिखाई देता है।
वेतन समझौता की बैठकों में मेमोरेंडम का अंडरस्टैंडिंग के समय 01.01.2017 से 31.03.2020 तक के 39 महीने के बकाया को लेकर भी विवाद और देरी का मुद्दा सामने आया था। लेकिन उसे नजरअंदाज करते हुए तीन यूनियनों ने दस्तखत कर दिया। जिसमें एमजीबी और समझौते की अवधि पर बीएमसी भी सहमत था अब वे सभी कह रहे है कि गलती हो गई, गलती एक बार हो सकती है, लेकिन बार-बार मजदूरों के हितों के विपरीत फैसले हों तो यह गलती नहीं बल्कि मजदूरों के साथ छलावा है जिस पर मजदूरों को सवाल पूछना ही होगा।
एक तरफ मजदूरों के लिए 13%, दूसरी तरफ अधिकारियों का समझौता, यह अंतर क्यों?
सीटू का आरोप है कि जिस दौर में कर्मचारियों के लिए 13% MGB और 26.5% पर्क्स का समझौता स्वीकार किया गया, उसी समय NJCS मे बहुमत के आधार मेमोरेंडम का अंडरस्टैंडिंग होने के दूसरे ही दिन अर्थात 23 अक्टूबर 2021 को अधिकारियों के वेतन वृद्धि की घोषणा कर दी गई, जिसमें 15% एमजीबी तथा 35% पर्क्स का जिक्र था। सीटू ने उस समय हुए मेमोरेंडम का अंडरस्टैंडिंग का विरोध करते हुए दस्तखत न करने की बात बार-बार कहीं किंतु वे नहीं माने।इसी तरह 8 फरवरी 2023 को बोनस फार्मूले के समय भी सीटू ने मना किया किंतु उन्होंने बहुमत बना लिया। सवाल यह है कि मजदूरों के लिए हर बार ‘बहुमत’ का हवाला क्यों और उनके हिस्से में कमतर समझौता क्यों?
चुनाव में चेहरे नहीं, पिछले दस वर्षों का हिसाब देखिए
सीटू का कहना है कि इंटक और बीएमएस सहित सभी यूनियनों से मजदूरों को एक ही सवाल पूछना चाहिए कि आपने मजदूरों के लिए क्या संघर्ष किया और किन फैसलों पर हस्ताक्षर किए? जो यूनियन संघर्ष के समय पीछे हटे, बहुमत के नाम पर विवादित फैसलों का हिस्सा बने और आज उन्हीं फैसलों के परिणामों पर सवाल उठाते हैं, उनके पुराने रिकॉर्ड को मजदूरों को जरूर देखना चाहिए।
सीटू ने कहा कि चुनाव केवल प्रतिनिधि यूनियन चुनने का अवसर नहीं, बल्कि पिछले संघर्षों और फैसलों का हिसाब लेने का अवसर भी है। इसलिए 24 सितंबर को मतदान से पहले यूनियन का चरित्र, उसका संघर्ष, उसके फैसले और मजदूरों के हितों के प्रति उसकी वास्तविक प्रतिबद्धता जरूर परखें।



