SAIL Bonus: क्या मजदूरों को पहले गड्ढे में धकेलना और फिर गड्ढे के किनारे खड़े होकर बचाने की नौटंकी करना ही नेतृत्व कहलाता है?
- 40,500 रुपये को छोड़कर तीन साल का औसत को आधार बनाना गणित था या बोनस घटाने की गारंटी?
सूचनाजी न्यूज, भिलाई। सेल कर्मचारियों की नज़र अब बोनस को लेकर होने वाली कवायद पर टिक गई है। त्योहार से पहले बोनस तय करने के लिए आवाज उठनी शुरू हो गई है। आखिर ट्रेड यूनियन इस मुद्दे पर क्या कर रही हैं। इसका जवाब आना शुरू हो गया है। सीटू भिलाई का कहना है कि जब दिल्ली में बोनस का नया फॉर्मूला तैयार किया जा रहा था, तभी सीटू ने उसका अध्ययन करके साफ चेतावनी दी थी। इस फॉर्मूले पर दस्तखत मत कीजिए।
सीटू ने कहा था कि तीन वर्षों का औसत निकालकर उसे बेस बनाना और फिर उत्पादन एवं मुनाफा के लिए दिए गए वेटेज के प्रतिशत के आधार पर बोनस तय करना भविष्य में बोनस को लगातार कम करने का रास्ता खोलेगा। लेकिन कुछ यूनियनों को शायद उस समय अपनी समझदारी से ज्यादा “हम हर हाल में ज्यादा बोनस लेकर आएंगे” वाले दावों पर भरोसा था।
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40,500 रुपये को छोड़कर तीन साल का औसत को आधार बनाना गणित था या बोनस घटाने की गारंटी?
यह फॉर्मूला 40,500 रुपये बोनस मिलने के बाद बनाया गया था। उससे पहले बोनस की राशि कम थी। जाहिर है, जब कम बोनस वाले वर्षों को जोड़कर तीन साल का औसत निकाला जाएगा तो बेस प्राइस 40,500 रुपये से कम ही आएगा। यानी जिस दिन फॉर्मूले पर दस्तखत हुए, उसी दिन भविष्य में बोनस कटौती की जमीन तैयार हो गई थी। अब सवाल यह है कि जिस गणित को सीटू पहले ही पढ़ चुकी थी, उस गणित को पढ़े बिना बाकी लोगों ने दस्तखत किस भरोसे पर किए थे?
अब बोनस घटा तो विरोध शुरू, पहले दस्तखत, फिर पछतावा!
पिछले तीन वर्षों से बोनस लगातार कम होता जा रहा है। अब 40,500 रुपये से कम बोनस मिलने के बाद वे यूनियनें भी विरोध की मुद्रा में आ गई हैं, जिन्होंने सीटू की चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए इसी फॉर्मूले पर दस्तखत किए थे। सवाल बिल्कुल सीधा है? जब सीटू मना कर रही थी, तब दस्तखत क्यों किए? और जब परिणाम सामने आ गया तो अब विरोध किस बात का? क्या मजदूरों को पहले गड्ढे में धकेलना और फिर गड्ढे के किनारे खड़े होकर बचाने की नौटंकी करना ही नेतृत्व कहलाता है?
सीटू ने न दस्तखत किए, न संघर्ष छोड़ा: हर साल बैठक में मजबूती से रखी बात
यह पांच वर्षों के लिए बनाया गया फॉर्मूला है, लेकिन सीटू ने इसके खिलाफ अपना संघर्ष लगातार जारी रखा है। सीटू हर वर्ष बोनस की बैठकों में शामिल होकर मजदूरों के हित में अपनी बात मजबूती से रखती रही है और इस गलत फॉर्मूले के दुष्परिणामों को लगातार उजागर करती रही है। इसलिए आज मजदूरों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि सही समय पर चेतावनी देने वाला कौन था और चेतावनी के बावजूद दस्तखत करने वाला कौन था।
अब बैठकों और बयानबाजी से नहीं, प्रबंधन के सामने आर-पार की लड़ाई चाहिए
अब समय केवल विरोध दर्ज कराने या बयान देने का नहीं है। यदि बोनस पर मजदूरों का हक बचाना है तो प्रबंधन के सामने आर-पार की ताकतवर लड़ाई खड़ी करनी होगी। आज हमारे छात्र और नौजवान साथी जिस जुझारूपन और संघर्ष की भावना के साथ अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, उसी तरह मजदूरों को भी एकजुट होकर संघर्ष का बिगुल फूंकना होगा।
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हक मांगने भर से नहीं मिलता, उसके लिए संघर्ष भी करना होता है जरूरी
सीटू ने कहा कि प्रबंधन से हक मांगने भर से नहीं मिलता, संगठित ताकत से छीनकर लेना पड़ता है। गलत फॉर्मूले, घटते बोनस और मजदूरों के अधिकारों पर हो रहे हमले के खिलाफ अब निर्णायक संघर्ष ही रास्ता है। तभी प्रबंधन अपने गलत मंसूबों से पीछे हटेगा और कर्मियों का हक मारना बंद करेगा।








