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दुर्ग जिले के बदहाल स्कूलों का SFI ने किया पोस्टमार्टम, शिक्षा मंत्री जी आपके गृह जिले का है ये हाल

Azmat ali 04/09/2026 1 minute read
Students Federation of India visits government schools as part of the Save Schools campaign

स्कूल बचाओ अभियान: वैशाली नगर विधानसभा क्षेत्र के घासीदास नगर, हाउसिंग बोर्ड स्थित शासकीय नवीन प्राथमिक शाला का दौरा एसएफआई ने किया।

  • स्कूल बचाओ अभियान के तहत स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया का सरकारी स्कूलों में दौरा।
  • घासीदास नगर के स्कूल की बदहाल व्यवस्था ने खोली सरकारी दावों की पोल।
  • सरकारी स्कूल बचेंगे, तभी गरीबों के बच्चे पढ़ेंगे और तभी समान शिक्षा का अधिकार मजबूत होगा।
  • स्कूल का दौरा करने पर सामने आया कि कक्षा पहली, दूसरी एवं तीसरी के बच्चों के लिए पर्याप्त बैठने की व्यवस्था नहीं है।

सूचनाजी न्यूज, दुर्ग। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के “स्कूल बचाओ अभियान” के तहत दुर्ग जिला इकाई द्वारा वैशाली नगर विधानसभा क्षेत्र के घासीदास नगर, हाउसिंग बोर्ड स्थित शासकीय नवीन प्राथमिक शाला का दौरा किया गया। एसएफआई की टीम ने विद्यालय की वास्तविक स्थिति, विद्यार्थियों को मिल रही सुविधाओं तथा शिक्षकों की उपलब्धता का जायजा लिया।

स्कूल की समस्याओं को लेकर जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर तत्काल समाधान की मांग की गई। स्कूल की स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि जब सरकार सरकारी स्कूलों को मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे करती है, तो जमीनी स्तर पर बच्चों को बुनियादी सुविधाओं के लिए भी क्यों संघर्ष करना पड़ रहा है? खास बात यह है कि छत्तीसगढ़ के शिक्षा मंत्री भी दुर्ग जिले से आते हैं। इन्हें के गृह जिले के स्कूलों के बदहाल हालात की तस्वीर सामने आई है।

81 बच्चे, लेकिन प्रधान पाठक नहीं, शिक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे

घासीदास नगर के इस प्राथमिक स्कूल में 81 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, लेकिन स्कूल का प्रधान पाठक पद रिक्त है। पूर्व प्रधान पाठक के सेवानिवृत्त होने के बाद अब तक इस पद पर नियुक्ति नहीं की गई है। स्कूल में वर्तमान में मात्र दो शिक्षक कार्यरत हैं। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों के लिए पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था नहीं होना सरकार की शिक्षा नीति पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। एस एफ आई का कहना है कि शिक्षक नियुक्त करना सरकार की जिम्मेदारी है, बच्चों को शिक्षक के अभाव में पढ़ाई से वंचित रखना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

बच्चों के लिए बेंच नहीं, जमीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर

स्कूल का दौरा करने पर सामने आया कि कक्षा पहली, दूसरी एवं तीसरी के बच्चों के लिए पर्याप्त बैठने की व्यवस्था नहीं है और बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। जिस दौर में सरकार स्मार्ट क्लास और डिजिटल शिक्षा के बड़े-बड़े दावे कर रही है, उसी दौर में सरकारी स्कूल के छोटे-छोटे बच्चे जमीन पर बैठने को मजबूर हैं। यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था के प्रति बरती जा रही घोर लापरवाही का प्रमाण है।

टूटा मुख्य द्वार, खराब पानी और जलभराव, स्कूल है या उपेक्षा का केंद्र?

स्कूल का मुख्य प्रवेश द्वार टूटा हुआ है, जिससे बच्चों की सुरक्षा प्रभावित हो रही है। पीने के पानी की समुचित व्यवस्था नहीं है और उपलब्ध हैंडपंप का पानी भी बच्चों के लिए पीने योग्य नहीं बताया गया है। बरसात में स्कूल परिसर के अंदर जलभराव हो जाता है तथा कच्ची सड़क के कारण बच्चों को आने-जाने में परेशानी होती है। स्कूल परिसर में उगी झाड़ियां और अनावश्यक वनस्पति भी बच्चों की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय हैं। सवाल है कि सरकार बच्चों को सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण देने की जिम्मेदारी कब निभाएगी?

सरकारी स्कूलों की अनदेखी कोई संयोग नहीं बल्कि शिक्षा के अधिकार पर हमला है

स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया की अर्चना ध्रुव ने आरोप लगाया कि सरकारी स्कूलों की समस्याएं केवल एक विद्यालय तक सीमित नहीं हैं। शिक्षकों के पद खाली रखना, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, भवनों और परिसरों का रखरखाव न करना तथा सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लगातार कमजोर करना एक व्यापक समस्या बन चुकी है। एक तरफ सरकार “सबके लिए शिक्षा” की बात करती है, दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों को सुविधाओं और संसाधनों से वंचित किया जा रहा है। SFI का स्पष्ट मत है कि सरकारी स्कूल कमजोर होंगे तो सबसे ज्यादा नुकसान गरीब, मजदूर, किसान और आम परिवारों के बच्चों को होगा। यह शिक्षा के अधिकार और समान शिक्षा व्यवस्था पर सीधा हमला है।

स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया की मांग, स्कूल बचाओ, शिक्षक दो, सुविधाएं दो

एसएफआई दुर्ग जिला इकाई ने जिला प्रशासन से मांग की है कि रिक्त प्रधान पाठक पद पर तत्काल नियुक्ति, विद्यार्थियों की संख्या के अनुरूप पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था, सभी बच्चों के लिए पर्याप्त डेस्क-बेंच, स्वच्छ एवं सुरक्षित पेयजल, टूटे मुख्य द्वार की मरम्मत, स्कूल परिसर एवं कच्ची सड़क की व्यवस्था तथा जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान तत्काल किया जाए। साथ ही संबंधित अधिकारियों द्वारा विद्यालय का नियमित निरीक्षण कर समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

एसएफआई ने कहा कि स्कूल बचाओ अभियान केवल एक विद्यालय की समस्याओं को उठाने का अभियान नहीं है, बल्कि यह सरकारी शिक्षा व्यवस्था को बचाने की लड़ाई है। सरकार यदि वास्तव में शिक्षा को प्राथमिकता देती है तो उसे विज्ञापनों और भाषणों से बाहर निकलकर सरकारी स्कूलों की जमीन पर मौजूद समस्याओं का समाधान करना होगा। बच्चों को जमीन पर बैठाकर “डिजिटल इंडिया” और “विकसित भारत” का सपना नहीं दिखाया जा सकता। स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया का स्पष्ट मानना है कि सरकारी स्कूल बचेंगे, तभी गरीबों के बच्चे पढ़ेंगे और तभी समान शिक्षा का अधिकार मजबूत होगा।

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