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62% कर्मचारी हर हफ्ते कर रहे बेगार, मुफ्त में काम, भारत नंबर 1

Azmat ali 05/09/2026 1 minute read
Employees Perform Unpaid Work Every Week India Ranks Number one

द सीएसआर जर्नल की 'पीपल एट वर्क 2026' रिपोर्ट: भारत में बिना पैसे के काम करने वाले कर्मचारियों का अनुपात सबसे ज़्यादा है।

  • पढ़ें हिंदुस्तान समाचार पत्र के दिल्ली, झारखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड स्टेट हेड रह चुके अनिल भास्कर के विचार। 
  • दुनियाभर में 62 प्रतिशत कर्मचारी हर हफ़्ते पांच घंटे तक बिना पैसे वाला काम करते हैं।
  • 26 प्रतिशत कर्मचारी बिना पैसे वाले कामों में छह से 15 घंटे लगाते हैं।
  • 12 प्रतिशत कर्मचारी ऐसे कामों में 16 घंटे या उससे ज़्यादा समय देते हैं।
  • कर्मचारियों ने तनाव महसूस करने और अपनी मौजूदा नौकरी छोड़ने की इच्छा भी ज़ाहिर की।

सूचनाजी न्यूज, दिल्ली। नौकरी से जुड़े साथियों की आम शिकायत क्या रही है? बेगार। यानी बिन पैसा काम। पर यहां बेगार से आशय है तय पगार में काम के बेहिसाब घंटे। 24 घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनल हों या फिर 24 घंटे में एक बार प्रकाशित होने वाले अख़बार, दोनों जगह सेवाएं देने वाले साथियों का यह साझा दर्द रहा है। खासकर रिपोर्टिंग से जुड़े साथियों का। या कारखानों, आफिस में काम करने वाले। उनके लिए न काम के घंटे तय होते हैं, न दिन-रात की सीमा। वे आमतौर पर 24 घंटे के सिपाही होते हैं। वर्क लाइफ बैलेंस के फलसफे से कोसों दूर। मगर इस बिरादरी को शायद यह जानकर शायद थोड़ी तसल्ली हो कि बेगार करने वाले वे अकेले नहीं।

हिंदुस्तान समाचार पत्र के दिल्ली, झारखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड स्टेट हेड रह चुके अनिल भास्कर ने बेगार सेवा पर टिप्पणी की। लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी, बरेली, इलाहाबाद में बतौर संपादक काम कर चुके अनिल भास्कर ने द सीएसआर जर्नल द्वारा हाल ही जारी ‘पीपल एट वर्क 2026’ रिपोर्ट को साझा किया। रिपोर्ट कहती है कि भारत में बिना पैसे के काम करने वाले कर्मचारियों का अनुपात सबसे ज़्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार 24 प्रतिशत लोग हर हफ़्ते ऐसे कामों में सामान्य से 16 घंटे या उससे भी ज़्यादा समय बेगार करते हैं। इसके अलावा 40 प्रतिशत कर्मचारी हर हफ़्ते छह से 15 घंटे बिना पैसे वाले कामों में बिताते हैं।

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इससे पता चलता है कि भारत के कर्मचारियों का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी मेहनताने के अतिरिक्त समय दे रहा है। ऐसा भी नहीं कि बेगार का यह आलम सिर्फ अपने देश में है। बाकी दुनिया में भी यह चलन खूब है। फर्क सिर्फ घंटों का है।

रिपोर्ट कहती है कि दुनियाभर में 62 प्रतिशत कर्मचारी हर हफ़्ते पांच घंटे तक बिना पैसे वाला काम करते हैं। वहीं, 26 प्रतिशत कर्मचारी बिना पैसे वाले कामों में छह से 15 घंटे लगाते हैं और 12 प्रतिशत कर्मचारी ऐसे कामों में 16 घंटे या उससे ज़्यादा समय देते हैं।

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दुर्भाग्य से बेगार का यह चलन किसी खास तरह के कार्यक्षेत्र तक सीमित नहीं है। नतीजों से पता चलता है कि हाइब्रिड या ऑफिस में काम करने वाले साथियों की तुलना में रिमोट वर्कर्स के बिना पैसे के काफी ज़्यादा काम करने की संभावना होती है। यह ट्रेंड बताता है कि रिमोट वर्क का तरीका अलग-अलग सेक्टर में बिना पैसे वाले काम के घंटों में बढ़ोतरी की वजह हो सकता है।

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इसके अलावा युवा कर्मचारियों में बिना पैसे के काम करने की संभावना ज़्यादा देखी गई है, जो काम के प्रति नज़रिए और व्यवहार में पीढ़ीगत अंतर को दिखाता है। यह वर्ग काम की ज़िम्मेदारियों को प्राथमिकता दे सकता है या अतिरिक्त कोशिशों के लिए पैसे की मांग करने में खुद को कमज़ोर महसूस कर सकता है।

लेकिन रिपोर्ट से एक खास बात यह पता चली है कि बिना पैसे वाले काम के घंटों में बढ़ोतरी का मतलब हमेशा प्रोडक्टिविटी बढ़ना नहीं होता है। जिन कर्मचारियों ने बताया कि वे बिना पैसे के ज़्यादा घंटे काम करते हैं, उन्होंने कहा कि उन्हें अक्सर ऐसा महसूस होता था कि वे अपनी क्षमता के हिसाब से कम प्रोडक्टिव हैं। इनमें से कई कर्मचारियों ने तनाव महसूस करने और अपनी मौजूदा नौकरी छोड़ने की इच्छा भी ज़ाहिर की। मीडिया संस्थानों को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। खासकर उन्हें जिनके लिए काम की गुणवत्ता अब भी महत्व रखती है।

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कुछ जानकार ये भी कहते हैं कि ‘बेगार’ अब मीडिया की निजी शिकायत नहीं, भारतीय कॉरपोरेट संस्कृति की खुली पोल है। ADP की ‘पीपल एट वर्क 2026’ रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 24% कर्मचारी हफ्ते में 16+ घण्टे और 40% 6-15 घण्टे बिना वेतन के काम झोंकते हैं। यह आंकड़ा वैश्विक औसत से कई गुना ऊपर है।

लम्बे बिना-पैसे वाले घण्टे ‘समर्पण’ नहीं, ‘अकुशल प्रबन्धन’ और ‘सीमाहीन उम्मीदों’ का नतीजा हैं। रिपोर्ट साफ कहती है,इससे उत्पादकता ही नहीं गिरती, बल्कि तनाव, थकान और नौकरी छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ती है।

रिमोट वर्कर्स और युवा कर्मचारियों पर यह बोझ सबसे भारी है। लचीलेपन के नाम पर ‘अदृश्य श्रम’ थोपा जा रहा है, जबकि ओवरटाइम नीति या तो अनुपस्थित है या सिर्फ कागज़ पर।

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