भिलाई स्टील प्लांट: मकान, लीज और रिटेंशन पर जमकर राजनीति, पर राहत शून्य

Bhilai Steel Plant Politics on Housing Lease and Retention But no Relief
  • राजनीति अपने चरम पर है, आश्वासनों का दौर जारी है।
  • प्रबंधन अपने फैसले पर अडिग है।
  • कर्मचारियों को किसी ठोस परिणाम का इंतजार है।

सूचनाजी न्यूज, भिलाई। भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) में रिटेंशन नीति को लेकर पिछले चार महीने से चल रहा विवाद लगातार गहराता जा रहा है। एक ओर जहां इस मुद्दे पर राजनीति तेज हो गई है, वहीं प्रभावित कर्मचारियों को अब तक किसी ठोस समाधान का इंतजार है।

बीएसपी प्रबंधन ने 1 दिसंबर से रिटेंशन व्यवस्था को पूरी तरह बंद कर दिया। पहले इस योजना के तहत कर्मचारियों को निर्धारित समय सीमा तक क्वार्टर में रहने की छूट मिलती थी। इस दौरान यदि कर्मचारी क्वार्टर खाली नहीं करता था, तो उस पर 32 गुना पेनल्टी का प्रावधान था। इसके एवज में प्रबंधन रिटेंशनधारियों से 7 से 9 लाख रुपये तक की राशि जमा कराता था और 6 माह की अवधि के लिए क्वार्टर में रहने की अनुमति देता था।

रिटेंशन की अनुमति मेडिकल ग्राउंड, बच्चों की शिक्षा या मकान निर्माण जैसे कारणों पर दी जाती थी। कर्मचारियों को इसके लिए संबंधित दस्तावेज भी जमा करने होते थे। लंबे समय तक यह व्यवस्था चलती रही और कई कर्मचारियों को अप्रत्यक्ष रूप से छूट मिलती रही। अधिकांश कर्मचारी समय पर किराया और बिजली बिल जमा करते रहे, जिससे उन्हें यह विश्वास हो गया कि वे क्वार्टर में रह सकते हैं।

हालांकि, अचानक जारी सर्कुलर ने स्थिति बदल दी। 64 गुना किराया और सख्त नियम लागू कर दिए गए। साथ ही, 1 दिसंबर के बाद सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों का ग्रेच्युटी और ईएल एनकैशमेंट जैसी बड़ी राशि भी रोक दी गई, यदि उन्होंने क्वार्टर खाली नहीं किया। यह राशि कई मामलों में 25 से 35 लाख रुपये तक बताई जा रही है।

इस फैसले के बाद जिन कर्मचारियों के पास खुद का आवास था, वे जल्दबाजी में क्वार्टर खाली करने लगे, जबकि अन्य कर्मचारियों में असमंजस और नाराजगी बढ़ गई। बताया जा रहा है कि लगभग 1370 रिटेंशनधारियों में से करीब 1300 कर्मचारी नियमित रूप से किराया और बिजली बिल का भुगतान करते थे, जबकि मात्र 70 लोग ही भुगतान में चूक कर रहे थे।

मामले ने जल्द ही राजनीतिक रूप ले लिया। 20 दिसंबर को भिलाई के विधायक ने सिविक सेंटर में चार दिवसीय अनशन किया। इसके बाद दुर्ग के सांसद विजय बघेल और पूर्व विधायक प्रेम प्रकाश पांडे ने दिल्ली जाकर इस्पात मंत्री से मुलाकात कर मुद्दा उठाया। विभिन्न ट्रेड यूनियनों और संगठनों ने भी लगातार प्रबंधन से बातचीत की, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया।

हाल ही में 22 मार्च को विधायक देवेंद्र यादव ने एक किलोमीटर मार्च निकालकर प्रबंधन को चेतावनी दी कि एक माह के भीतर समाधान नहीं हुआ तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा। इस पूरे घटनाक्रम में यह साफ नजर आ रहा है कि मुद्दे पर राजनीति तो खूब हो रही है, लेकिन प्रभावित कर्मचारियों को अब तक कोई राहत नहीं मिल सकी है। कई सेवानिवृत्त कर्मचारी अपने क्वार्टर में ही टिके हुए हैं, क्योंकि उनकी बड़ी रकम प्रबंधन के पास जमा है। यदि इस राशि पर बैंक ब्याज का अनुमान लगाया जाए, तो यह प्रति माह 20 हजार रुपये से अधिक बैठता है।

कर्मचारियों के बीच यह आशंका भी जताई जा रही है कि कहीं यह मामला वर्ष 2003 के लीज आंदोलन की तरह लंबा न खिंच जाए, जिसमें वर्षों बाद भी कई लोगों को न तो क्वार्टर मिला और न ही वे अपनी जमा पूंजी से नया मकान खरीद पाए।

फिलहाल स्थिति यह है कि राजनीति अपने चरम पर है, आश्वासनों का दौर जारी है, लेकिन प्रबंधन अपने फैसले पर अडिग है और प्रभावित कर्मचारियों को किसी ठोस परिणाम का इंतजार है।