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12 फरवरी हड़ताल: सीटू बोला-“आप तो नहीं लड़ सकते, कम से कम हम मजदूरों को तो लड़ने दो साहब”

Azmat ali 11/02/2026 1 minute read
12th February Strike CITU Said You cannot Fight at Least Let Us Workers Fight

केंद्र के आदेश पर ही भिलाई इस्पात संयंत्र में स्थाई कर्मियों की संख्या 6500 करने और ठेका श्रमिकों में 20% की कटौती हो रही।

  • केंद्र सरकार 29 श्रम कानूनों को खत्म कर मालिकों और प्रबंधन के पक्ष में नए श्रम कोड लागू कर रहा है।

सूचनाजी न्यूज, भिलाई। केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ 12 फरवरी को होने वाली हड़ताल पर कर्मचारी यूनियन सीटू ने सेल बीएसपी प्रबंधन पर करार जुबानी हमला किया है। पोल खोलकर रख दिया है।

हड़ताल के बारे में प्रबंधन द्वारा जारी किए गए पत्र पर सीटू नेता ने कहा कि इस्पात मंत्रालय ने कह दिया कि भिलाई इस्पात संयंत्र में स्थाई कर्मियों की संख्या 6500 तक कर दो, फिर कहा कि ठेका श्रमिकों में 20% की कटौती करो, उद्योग के अंदर फिक्स्ड टर्म रोजगार के तहत लोगों की भर्ती करो जो कि अस्पताल में शुरू हो चुका है।

कर्मियों के वेतन समझौते पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने अफॉर्डेबिलिटी क्लाज़ लगाकर ना केवल वेतन समझौता को देर से शुरू करवाया, बल्कि एरियर्स देने पर भी पाबंदी लगा दिया जिसके कारण 9 साल पूर्ण होने के बाद भी वेतन समझौता लंबित है।

सीटू भिलाई के नेताओं ने कहा-अब केंद्र सरकार मजदूरों के द्वारा लंबे संघर्षों के बाद हासिल किए गए 29 श्रम कानूनों को खत्म कर मालिकों और प्रबंधन के पक्ष में नए श्रम कोड लागू कर रहा है।

प्रबंधन जानता है कि यह सब कंपनी एवं कंपनी में काम करने वाले कामगार के पक्ष में नहीं है। बावजूद इसके हम जानते हैं कि आप तो इन सबके खिलाफ लड़ नहीं सकते। कम से कम हम मजदूरों को तो इसके खिलाफ लड़ने दो।

हम पर लागू होने वाले मुद्दों को केंद्रीय बताकर गुमराह ना करें

भिलाई इस्पात संयंत्र में भी समय-समय पर केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा पारित किए जाने वाले श्रम कानून लागू होते हैं। आज श्रम कानून पर ही हमला हो रहा है। ऐसे में प्रबंधन द्वारा कह देना कि संयुक्त यूनियनों द्वारा हड़ताल के लिए दिए गए ज्ञापन के अधिकांश मांग/मुद्दे केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार से जुड़े हुए हैं।

प्रबंधन के सोच पर ही सवालिया निशान पैदा करता है। क्या प्रबंधन इस बात को सुनिश्चित कर सकता है कि आने वाले दिनों में जब लेबर कोड लागू हो जाएगा तो भिलाई स्टील प्लांट उन कानून से अछूता रहेगा। यदि ऐसा नहीं है तो केंद्र के द्वारा अथवा राज्य के द्वारा लिए जा रहे गलत निर्णय के खिलाफ हमारी लड़ाई जायज है और ऐसी लड़ाई में 12 फरवरी को हड़ताल करना भी वैध है।

गलत चीजों को मान लेना शांति और सौहार्द नहीं होता

आंदोलन के दौरान प्रबंधक अक्सर शांति और सौहार्द की दुहाई देता है। किंतु जितने भी संयंत्र विरोधी कार्य होता हैं, उसको रोक पाने में यही प्रबंधन नाकाम रहता हैं। अधिकारों के लिए लड़ना शांति भंग करना नहीं होता है। बल्कि जुल्म को सहना एवं अन्याय के खिलाफ आवाज ना उठाना ही सही मायने मे अशांति को आवाज देना है।

ठेका मजदूरों को अभी भी पूरा वेतन नहीं दिला पाता है भिलाई प्रबंधन

ठेका मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी नही दिला पाने वाले भिलाई प्रबंधन द्वारा मुद्दों को केंद्रीय बताकर बात टालना शोभा नहीं देता। प्रबंधन के नाक के नीचे कई मजदूरो को कैश पेमेंट दिया जा रहा है। ठेका मजदूरों को पैसा देने के बाद पैसा वापस ले लिया जाता है पैसा वापस नहीं देने पर गेटपास जमा करवा लिया जाता है।

ठेकेदार द्वारा सीपीएफ एवं ईएसआईसी का पूरा पैसा जमा नहीं किया जाता है। यह सब प्रबंधन के सामने हो रहा है। ऑपरेटिंग अथॉरिटी से बार-बार शिकायत करने के बावजूद वे कुछ नहीं करते है। फिर भी भिलाई के मजदूरों के संगठित होने और संघर्ष करने पर रोक लगाते हुए अन्याय को सहते हुए भी शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील करता है। वही दल्ली राजहरा के ठेका मजदूर लड़कर अपना पूरा वेतन ले लेते हैं।

केंद्र एवं राज्य के श्रम अधिकारियों के अधिकारों में भी हो रही है कटौती

सीटू नेता ने कहा कि प्रबंधन हड़ताल के सुलह के लिए जिन अधिकारियों का हवाला दे रहा है वास्तव में उनके अधिकारों में भी कटौती करने का प्रावधान इन नए श्रम कोड में दर्ज है। अब फैक्ट्री इंस्पेक्टर का नाम बदलकर फैसिलिटेटर कर दिया गया है, जिनका काम पीड़ित कर्मियों के द्वारा आवेदन करने पर जांच करके निर्णय देना होता था। किंतु अब सरकार के इजाजत के बगैर वह उद्योग के अंदर तक नहीं घुस सकेंगे।

इसका स्पष्ट मतलब है कि मालिकों एवं प्रबंधन के पक्ष में निर्णय देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। सुलह बैठक करना एवं हड़ताल के मुद्दों को सीज़ कर लेने जैसी बातों का कोई मायने नहीं है, क्योंकि प्रबंधन पिछले दिनों एनजेसीएस के मुद्दे पर केंद्रीय श्रम आयुक्त की बातों पर काम करने के लिए तैयार तक नहीं हुआ था।

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