ETP, पानी और जमीन से जुड़े अहम मुद्दों पर सहमति। बीएसपी की विस्तार योजनाओं पर फोकस। मरोदा-2 जलाशय के उपयोग पर भी बड़ा फैसला।
- प्राथमिक चरण की ETP स्थापना लागत का 20 प्रतिशत बीएसपी और शेष 80 प्रतिशत लागत NSPCL वहन करेगी।
सूचनाजी न्यूज, भिलाई। भिलाई इस्पात संयंत्र के विस्तार और भविष्य की ऊर्जा जरूरतों से जुड़े 1×800 मेगावाट पावर यूनिट प्रोजेक्ट को लेकर सेल और एनएसपीसीएल के बीच महत्वपूर्ण सहमति बनी है। 28 जुलाई 2026 को जारी Record Notes of Discussions के मुताबिक, बीएसपी और एनटीपीसी-सेल पावर कंपनी लिमिटेड (NSPCL) के बीच 1×800 मेगावाट यूनिट से संबंधित कई अहम तकनीकी और संसाधन संबंधी मुद्दों का समाधान किया गया है।
इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बीएसपी की मौजूदा और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पानी, Effluent Treatment Plant (ETP), जमीन और अपशिष्ट जल प्रबंधन को लेकर जिम्मेदारियां तय की गई हैं। इससे प्रस्तावित 800 मेगावाट यूनिट की स्थापना के साथ बीएसपी के मौजूदा संचालन और विस्तार योजनाओं के बीच बेहतर समन्वय की उम्मीद है।
2000 घन मीटर प्रति घंटे क्षमता का ETP
बैठक में तय हुआ कि 800 मेगावाट परियोजना के हिस्से के रूप में NSPCL करीब 2000 घन मीटर प्रति घंटे क्षमता वाले ETP की डिजाइन, इंजीनियरिंग, सप्लाई, स्थापना, परीक्षण और कमीशनिंग करेगी।
ETP के कैपिटल कॉस्ट को लेकर भी सहमति बनी है। प्राथमिक चरण की ETP स्थापना लागत का 20 प्रतिशत बीएसपी और शेष 80 प्रतिशत लागत NSPCL वहन करेगी। इसके अलावा ETP के सेकेंडरी और टर्शियरी चरणों की लागत NSPCL के हिस्से में होगी।
बीएसपी के हित में एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी है कि ETP से निकलने वाले ट्रीटेड एफ्लुएंट वाटर के उपयोग और उसके प्रबंधन को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनाई गई है।
बीएसपी की जमीन पर बनेगा ETP
समझौते के अनुसार ETP और उससे जुड़े ट्रीटेड वाटर रिजर्वायर के लिए करीब 20 एकड़ जमीन बीएसपी की ओर से उपलब्ध कराई जाएगी। यह जमीन प्रस्तावित 800 मेगावाट यूनिट के आसपास उपलब्ध कराने पर विचार किया गया है और NSPCL को इसे Right to Use के आधार पर दिया जाएगा। यानी परियोजना के लिए आवश्यक अतिरिक्त बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए बीएसपी जमीन उपलब्ध कराएगा, जबकि उससे जुड़ी परियोजना गतिविधियों की जिम्मेदारी NSPCL की होगी।
बीएसपी के पानी पर नहीं पड़ेगा अतिरिक्त दबाव
पानी से जुड़े मुद्दे पर भी महत्वपूर्ण व्यवस्था की गई है। दस्तावेज के मुताबिक 800 मेगावाट यूनिट के लिए पानी की आवश्यकता करीब 2400 घन मीटर प्रति घंटे होगी। इसका एक हिस्सा मौजूदा 2×250 मेगावाट प्लांट की सरप्लस वाटर एलोकेशन से और शेष ETP के माध्यम से पूरा करने का प्रस्ताव है।
मरोदा-2 जलाशय के अतिरिक्त इस्तेमाल को लेकर बीएसपी ने अपनी विस्तार योजनाओं को देखते हुए कठिनाई जताई। इसके बाद वैकल्पिक व्यवस्था पर सहमति बनी।
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भर्दा कोनारी एनीकट से पानी लाने की तैयारी
बीएसपी ने NSPCL से भर्दा कोनारी एनीकट के पास इनलेट पाइपलाइन में वाल्व लगाने और वहां से पानी खींचने की व्यवस्था करने का अनुरोध किया था। NSPCL ने 1×800 मेगावाट परियोजना में वाल्व की व्यवस्था को शामिल करने पर सहमति दी है।
साथ ही वाल्व से 800 मेगावाट यूनिट तक आगे की पाइपलाइन भी NSPCL के दायरे में रखने पर सहमति बनी है। इस व्यवस्था से बीएसपी की मौजूदा जल जरूरतों और भविष्य की विस्तार योजनाओं पर अतिरिक्त दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। खास बात यह है कि भर्दा कोनारी से मरोदा-2 तक पानी पहुंचाने में लगने वाले बिजली खर्च को भी NSPCL वहन करेगी।
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बीएसपी के लिए अहम है अपशिष्ट जल की व्यवस्था
समझौते में यह भी तय किया गया है कि NSPCL ऐसा ETP डिजाइन और निर्माण करेगी, जिससे ट्रीटमेंट के बाद 2000 घन मीटर प्रति घंटे तक का पानी उपलब्ध हो सके। यदि पूरा ट्रीटेड पानी NSPCL द्वारा उपयोग नहीं किया जा पाता है तो उसे मरोदा-1 रिजर्वायर की ओर डायवर्ट करने की व्यवस्था पर भी विचार किया गया है। शटडाउन और ब्रेकडाउन के दौरान भी यह व्यवस्था लागू रहेगी तथा पानी का टर्शियरी ट्रीटमेंट किया जाएगा।
इसके अलावा आउटलेट C-चैनल 14, 19 और 20 तथा ऐश पोंड के डिकैंटेड वाटर की पंपिंग, पंप हाउस, प्री-ट्रीटमेंट, बिजली और पाइपलाइन से जुड़ी व्यवस्था प्रस्तावित ETP पैकेज में शामिल होगी।
बीएसपी-NSPCL के बीच बनेगी संयुक्त समन्वय समिति
प्रोजेक्ट की स्थापना के दौरान दोनों संस्थाओं के बीच तकनीकी और इंटरफेस से जुड़े मुद्दों के त्वरित समाधान के लिए संयुक्त समन्वय समिति गठित करने पर भी सहमति बनी है। कुल मिलाकर यह समझौता केवल 800 मेगावाट पावर यूनिट की स्थापना तक सीमित नहीं है। इसमें पानी, ETP, जमीन, अपशिष्ट जल और परियोजना के इंटरफेस जैसे ऐसे विषयों को शामिल किया गया है, जिनका सीधा संबंध बीएसपी के भविष्य के संचालन और विस्तार से है। बीएसपी की मौजूदा जल जरूरतों और भविष्य की विस्तार योजनाओं को ध्यान में रखकर वैकल्पिक जल स्रोत की व्यवस्था को लेकर बनी सहमति इस पूरे समझौते का महत्वपूर्ण पक्ष है।

