भिलाई इस्पात संयंत्र के अधिकारियों की टीम विशाखापट्टनम मॉडल को देखने गई थी। आज उसी मॉडल का भयानक रिजल्ट सामने आ रहा।
- दुर्घटना केवल हादसा नहीं, प्रबंधन की विफलता है।
- विशाखापट्टनम स्टील प्लांट में हजारों श्रमिकों के रोजगार पर लगातार खतरा मंडरा रहा है।
- लगभग 3000 स्थायी कर्मियों तथा 5000 से अधिक ठेका श्रमिकों की छंटनी और कार्यबल में कटौती ने उत्पादन व्यवस्था को कमजोर किया है।
सूचनाजी न्यूज, विशाखापट्टनम। भिलाई सीटू ने विशाखापट्टनम स्टील प्लांट में हुई दुर्घटना में मृत्यु हुई सभी कामगारों को श्रद्धांजलि देते हुए, घायल हुए सभी श्रमिकों के प्रति सीटू अपनी गहरी संवेदना व्यक्त की। दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग कर कहा कि विशाखापट्टनम स्टील प्लांट में हुई गंभीर औद्योगिक दुर्घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उत्पादन बढ़ाने और लागत घटाने की अंधी दौड़ में श्रमिकों की सुरक्षा को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। यह केवल एक तकनीकी दुर्घटना नहीं, बल्कि सुरक्षा मानकों के साथ लंबे समय से किए जा रहे समझौतों का परिणाम है।
सुरक्षा संबंधी चेतावनियों को किया गया अनदेखा
ट्रेड यूनियनों और श्रमिकों ने कई बार प्रबंधन के समक्ष उत्पादन प्रक्रियाओं, लेडल एवं कच्चे माल की गुणवत्ता तथा सुरक्षा संबंधी कमियों को उठाया था। विशेष रूप से निम्न गुणवत्ता के कच्चे माल और उपकरणों के उपयोग पर लगातार सवाल खड़े किए गए थे। दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रबंधन ने इन चेतावनियों को गंभीरता से लेने के बजाय “कॉस्ट कंट्रोल” और “कम लागत में अधिक उत्पादन” के लक्ष्य को प्राथमिकता दी। आज की दुर्घटना उसी सोच का परिणाम है।
निजीकरण की नीति ने बढ़ाया असुरक्षा का माहौल
सीटू महासचिव टी. जोगा राव ने कहा-वर्ष 2021 से केंद्र सरकार द्वारा विशाखापट्टनम स्टील प्लांट के निजीकरण की कोशिशें जारी हैं। निजीकरण की इस नीति ने पूरे संयंत्र में असुरक्षा और अनिश्चितता का वातावरण पैदा किया है। जब किसी सार्वजनिक उद्योग को बेचने की तैयारी की जाती है, तब निवेश, रखरखाव, सुरक्षा और मानव संसाधनों पर होने वाले खर्च को कम करने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा श्रमिकों को भुगतना पड़ता है।
रोजगार पर हमला और श्रमिक विरोधी मॉडल
विशाखापट्टनम स्टील प्लांट में हजारों श्रमिकों के रोजगार पर लगातार खतरा मंडरा रहा है। लगभग 3000 स्थायी कर्मियों तथा 5000 से अधिक ठेका श्रमिकों की छंटनी और कार्यबल में कटौती ने उत्पादन व्यवस्था को कमजोर किया है। अनुभवी श्रमिकों की संख्या कम होने तथा कार्य का बढ़ता दबाव भी असुरक्षा एवं जोखिमों को बढ़ाने वाला प्रमुख कारण है। श्रमिकों की कीमत पर मुनाफा कमाने की यह नीति पूरी तरह अस्वीकार्य है।
विशाखापट्टनम स्टील प्लांट की जमीन पर कॉरपोरेट नजर
देश का यह ऐतिहासिक इस्पात संयंत्र समुद्र तट के निकट स्थित है तथा विश्व के सबसे गहरे बंदरगाहों में शामिल गंगावाराम पोर्ट के समीप है। गंगावाराम पोर्ट को एक बड़े कॉरपोरेट घराने ने ले लिया है अब संयंत्र की विशाल भूमि पर बड़े कॉरपोरेट घरानों की नजर है। यदि सार्वजनिक संपत्तियों को औद्योगिक उत्पादन के बजाय निजी व्यावसायिक हितों के लिए उपयोग करने की कोशिश की जाती है, तो यह राष्ट्रीय संसाधनों के साथ गंभीर अन्याय होगा।
क्या यही मॉडल अपनाना चाहता है भिलाई स्टील प्लांट
सीटू नेता ने कहा कि पिछले दिनों भिलाई इस्पात संयंत्र के उच्च अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल विशाखापट्टनम मॉडल को देखने के लिए विशाखापट्टनम स्टील प्लांट का दौरा करके आया उसके बाद लगातार चर्चा में है कि भिलाई में भी लागत कम करने के नाम पर स्थाई एवं ठेका कर्मियों को कम करते हुए उत्पादन को बढ़ाने वाले उस मॉडल को लागू करना चाहते हैं जिस पर सीटू पहले ही सवाल उठा चुका है।
केंद्र और राज्य सरकार जवाब दें
इस दुर्घटना के बाद केंद्र सरकार और आंध्र प्रदेश सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं। जब निजीकरण की नीति को आगे बढ़ाया जा रहा है और श्रमिकों की आवाज को लगातार दबाया जा रहा है, तब सुरक्षा संबंधी विफलताओं के लिए भी सरकारों को जवाब देना होगा। जनता और श्रमिकों के सवालों का उत्तर केवल जांच समितियों से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई से दिया जाना चाहिए।
निजीकरण नहीं, सार्वजनिक उद्योगों को मजबूत करना होगा
पिछले कई वर्षों से विशाखापट्टनम की जनता और श्रमिक इस्पात संयंत्र को बचाने के लिए संघर्षरत हैं। यह संघर्ष केवल रोजगार बचाने का नहीं, बल्कि देश की सार्वजनिक संपत्तियों और आत्मनिर्भर औद्योगिक विकास को बचाने का संघर्ष है। सीटू स्पष्ट रूप से मानती है कि निजीकरण कभी भी सार्वजनिक उद्योगों का विकल्प नहीं हो सकता।
देश के रणनीतिक उद्योगों को बेचने के बजाय उन्हें आधुनिक तकनीक, पर्याप्त निवेश, बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और स्थायी रोजगार के माध्यम से मजबूत किया जाना चाहिए। विशाखापट्टनम स्टील प्लांट को बचाना देश के औद्योगिक भविष्य को बचाने के समान है।

