BSP Rail Mill: रेल मिल में रात की शिफ्ट ठप। दस तारीख गुजर गई, वेतन नहीं मिला तो मजदूरों का सब्र भी जवाब दे गया।
- नियमित कर्मचारियों का वेतन एक-दो दिन देर से पहुंचने पर हलचल मच जाती है।
- ठेका श्रमिकों की तनख्वाह कई दिन लटकने पर इतनी खामोशी क्यों रहती है?
- तनख्वाह के इंतजार में रेल मिल की नाइट शिफ्ट के मजदूर।
- गुस्साए ठेका श्रमिकों ने काम बंद कर बैठने का रास्ता चुना।
सूचनाजी न्यूज, भिलाई। भिलाई इस्पात संयंत्र के रेल मिल में बीती रात ठेका श्रमिकों ने वेतन नहीं मिलने से नाराज होकर नाइट शिफ्ट में काम करने से मना कर दिया और काम बंद कर बैठ गए। बताया जा रहा है कि इस स्थिति की जानकारी रेल मिल के उच्च अधिकारियों को भी थी। झोला उठाए मजदूर प्लांट से बाहर जाने की कोशिश किए, लेकिन जा नहीं सके। वापस विभाग में लौटे और बिना काम किए ही समय काट कर आक्रोश जाहिर किया। ऑपरेटिंग अथॉरिटी पर रोष व्यक्त किया जा रहा है। लगातार दो शिफ्ट ड्यूटी कराने का भी आरोप है।
सवाल यह है कि जब ठेका श्रमिकों को समय पर वेतन दिलाना प्रबंधन की जिम्मेदारी है, तो आखिर मजदूरों को अपने मेहनत के पैसे के लिए काम रोकने जैसी स्थिति तक पहुंचने की नौबत क्यों आई? क्या ठेकेदारों के सामने प्रबंधन की पकड़ कमजोर पड़ गई है या फिर मामला कुछ और है?
वेतन देने की तारीख तय, लेकिन शायद सिर्फ कागज पर
नियम और व्यवस्था के अनुसार ठेका श्रमिकों को महीने की 10 तारीख के भीतर वेतन मिल जाना चाहिए, लेकिन संयंत्र के अनेक विभागों में यह व्यवस्था जमीन पर दिखाई नहीं देती। कहीं वेतन देर से मिलता है तो कहीं भुगतान की प्रक्रिया ही मजदूरों के लिए इंतजार का दूसरा नाम बन जाती है। सवाल यह भी है कि जिस संस्थान में नियमित कर्मचारियों का वेतन एक-दो दिन देर से पहुंचने पर हलचल मच जाती है, वहां ठेका श्रमिकों की तनख्वाह कई दिन लटकने पर इतनी खामोशी क्यों रहती है?
मजदूरी तो पूरी मिलती है, उसके बाद आती है ठेकेदार की ‘कटौती व्यवस्था’
ठेका श्रमिकों की परेशानी केवल वेतन में देरी तक सीमित नहीं हैं। बल्कि मजदूरों को भुगतान की गई राशि में से कुछ हिस्सा वापस लेने की व्यवस्था शामिल है और ऐसा न करने पर गेट पास रोकने जैसी कार्रवाई की जाती है। ऐसे में सवाल सीधा है की मजदूर की मेहनत की कमाई पर आखिर किसका अधिकार है? और यदि यह गलत है तो प्रबंधन को जांच कर स्थिति पर रोक लगाने में परेशानी क्या है?
आठ घंटे की ड्यूटी खत्म होते ही दूसरी शिफ्ट, ऐसे में ‘सुरक्षा प्रथम’ सिर्फ नारे में?
रेल मिल सहित कई विभागों में आठ घंटे की ड्यूटी के बाद भी ठेका श्रमिकों के अतिरिक्त समय तक काम करने की स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं। अतिरिक्त कमाई की मजबूरी और लालच के बीच कई श्रमिक दूसरी शिफ्ट में भी काम करने को तैयार हो जाते हैं। स्थिति यहां तक पहुंचने की बात कही जा रही है कि कुछ मजदूरों से लगातार दो-दो शिफ्ट काम कराया जा रहा है। एक तरफ ‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘सुरक्षा प्रथम’ की बातें होती हैं, दूसरी तरफ थके हुए मजदूरों से अतिरिक्त काम कराया जा रहा है आखिर इन दोनों में तालमेल कहां है?
मजदूर बोलें तो परेशानी, चुप रहें तो व्यवस्था ठीक ,आखिर कब टूटेगी यह खामोशी?
ठेका श्रमिकों के सामने समय पर वेतन, कथित कटौती, अतिरिक्त काम और असुरक्षित परिस्थितियों जैसी समस्याएं हैं, लेकिन इन पर अपेक्षित सामूहिक आवाज सुनाई नहीं देती। स्थायी कर्मचारियों से लेकर जिम्मेदार अधिकारियों तक सभी को यह सवाल पहुंचना चाहिए कि मजदूरों को हाशिये पर रखकर संयंत्र की उत्पादन व्यवस्था कितने समय तक चलाई जाएगी।
ठेकेदारों की मनमानी हो या उनके साथ कथित सांठगांठ करने वाले अधिकारियों की भूमिका, यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो उस पर रोक लगाना प्रबंधन की जिम्मेदारी है। रेल मिल की बीती रात की घटना को केवल एक शिफ्ट के काम रुकने के रूप में देखना आसान होगा, लेकिन यह घटना उस बढ़ते असंतोष का संकेत भी हो सकती है, जिसे लंबे समय से अनदेखा किया जा रहा है।

