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Bhilai Mayor: किंतल कलिंगा जाति के आरक्षण पर सवाल, लक्ष्मीपति राजू की दावेदारी के लिए खतरे की घंटी? पढ़ें पार्षद क्या बोले…

Azmat ali 13/09/2026 (Last updated: 13/09/2026) 1 minute read
Lakshmipati Raju in the Race for Bhilai Mayor Questions Raised over Ccaste Certificate

भिलाई मेयर की रेस में लक्ष्मीपति राजू की दावेदारी पर जाति प्रमाण पत्र का सवाल, क्या किंतल कलिंगा जाति को आरक्षण का मिलेगा लाभ।

  • छत्तीसगढ़ में ओबीसी आरक्षण की सूची में जाति का नाम अहम, बिलासपुर हाईकोर्ट के 27 जनवरी 2026 के फैसले ने भी राज्य-विशेष आरक्षण पर डाला जोर।

अज़मत अली, भिलाई। भिलाई नगर निगम चुनाव की सरगर्मी बढ़ने लगी है। महापौर पद के दावेदारों के नाम धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं। कांग्रेस की ओर से सेक्टर 7 के पार्षद लक्ष्मीपति राजू भी महापौर पद के प्रमुख दावेदारों में बताए जा रहे हैं। लेकिन उनकी दावेदारी के साथ ही एक ऐसा सवाल उठ रहा है, जिसका जवाब चुनावी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकता है।

सवाल जाति और ओबीसी आरक्षण से जुड़ा

लक्ष्मीपति राजू आंध्र प्रदेश के मूल निवासी हैं और किंतल कलिंगा जाति से संबंधित हैं। यह जाति केंद्रीय पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल होने के आधार पर केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण का लाभ प्राप्त कर सकती है। लेकिन छत्तीसगढ़ की राज्य ओबीसी सूची में इस जाति की स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

भिलाई नगर निगम में महापौर पद की सीट ओबीसी आरक्षित है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या केवल जाति प्रमाण पत्र होने से किसी व्यक्ति को स्थानीय निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण का लाभ मिल सकता है, या संबंधित राज्य की ओबीसी सूची में जाति का शामिल होना भी जरूरी है?

लक्ष्मीपति राजू ने ये कहा

सूचनाजी.कॉम ने इसी सवाल की पड़ताल की। लक्ष्मीपति राजू बोले-मेरे पास एसडीएम से जारी प्रमाण पत्र है। जाति प्रमाण पत्र को लेकर जब सूचनाजी.कॉम ने राजू से सवाल किया तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनके पास एसडीएम द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र है और वह महापौर पद के लिए अपनी दावेदारी पेश करेंगे।

छात्र राजनीति और मज़बूत पकड़

भिलाई की सियासत में लक्ष्मीपति राजू की मजबूत पकड़ है। छात्र राजनीति से सक्रिय राजू अपने क्षेत्र में काफी मजबूती बनाए हुए हैं। सेक्टर 7 से चार बार से पार्षद हैं। जनता के बीच बने रहते हैं। हर काम को सक्रियता से करते हैं। पार्टी में अहम मुकाम बनाए हुए हैं। दो बार निर्दलीय भी पार्षद का चुनाव जीत चुके हैं। मेयर पद के लिए मजबूत दावेदार भी हैं।  जाति आरक्षण को लेकर उठाए जा रहे सवालों का जवाब आने के बाद ही स्थिति और साफ हो जाएगी।

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यानी उनकी ओर से दावेदारी को लेकर स्थिति स्पष्ट है। अब असली सवाल प्रमाण पत्र की वैधता से आगे बढ़कर उस प्रमाण पत्र के आधार पर छत्तीसगढ़ में स्थानीय निकाय के ओबीसी आरक्षण का लाभ लेने की पात्रता का है। यही वह बिंदु है, जिस पर चुनाव के दौरान राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो सकती है।

बिलासपुर हाईकोर्ट के फैसले में क्या कहा गया

इस पूरे मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर का 27 जनवरी 2026 का एक फैसला महत्वपूर्ण संदर्भ बनकर सामने आता है। न्यायाधीश अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने भिलाई स्मृति नगर की सुमन कुमारी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, शिक्षा विभाग से जुड़े मामले में राज्य-विशेष आरक्षण के सिद्धांत पर विचार किया।

फैसले में कहा गया है कि आरक्षण का लाभ राज्य-विशेष होता है और इसके लिए संबंधित राज्य के सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध जाति प्रमाण पत्र जरूरी है। केवल इसलिए कि किसी जाति को एक से अधिक राज्यों में मान्यता मिली हुई है, व्यक्ति दूसरे राज्य में आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। इसी तरह विवाह, निवास या एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण मात्र से दूसरे राज्य में आरक्षण का अधिकार स्वतः हासिल नहीं हो जाता।

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फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि किसी भर्ती में संबंधित राज्य का स्थायी जाति प्रमाण पत्र अनिवार्य किया गया है और उम्मीदवार के पास ऐसा प्रमाण पत्र नहीं है, तो वह आरक्षण का लाभ लेने के लिए पात्र नहीं होगा। लेकिन नगर निगम चुनाव में इस फैसले का कितना और किस तरह लागू होना है?

यही इस मामले का सबसे अहम सवाल है

कोर्ट का फैसला जिस संदर्भ में आया, वह शिक्षा विभाग से संबंधित था। इसलिए उसे सीधे नगर निगम चुनाव पर लागू मान लेना भी उचित नहीं होगा। स्थानीय निकाय चुनाव के लिए लागू राज्य के चुनावी नियम, आरक्षण संबंधी प्रावधान और सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी प्रमाण पत्र की जांच ही निर्णायक होगी। यही कारण है कि इस मामले में अंतिम निर्णय चुनाव प्रक्रिया के दौरान सक्षम चुनावी प्राधिकारी द्वारा ही किया जाना महत्वपूर्ण होगा।

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किंतल कलिंगा को लेकर क्या स्थिति?

सूचनाजी.कॉम की पड़ताल के दौरान संबंधित विषय की जानकारी रखने वाले सरकारी कार्मिकों और जानकारों से भी बात की गई। बताया गया कि केंद्रीय सूची और राज्य सूची दो अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। किसी जाति का केंद्रीय ओबीसी सूची में होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि उसी जाति को राज्य सरकार की नौकरियों या राज्य-स्तरीय आरक्षण में भी समान लाभ मिलेगा। राज्य में आरक्षण का लाभ लेने के लिए संबंधित जाति का राज्य की लागू आरक्षित सूची में होना महत्वपूर्ण होता है।

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यहीं से किंतल कलिंगा जाति को लेकर सवाल खड़ा हो रहा है। जानकारों के मुताबिक, यदि किसी जाति को राज्य की ओबीसी सूची में आरक्षण प्राप्त नहीं है, तो केवल केंद्रीय ओबीसी सूची में उसका नाम होने के आधार पर राज्य के आरक्षण का लाभ स्वतः नहीं मिल जाता।

हालांकि, किसी व्यक्ति के पास राज्य के सक्षम अधिकारी द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र मौजूद है तो उस प्रमाण पत्र की वैधता, उसमें दर्ज जाति और उसे जारी करने के आधार की जांच संबंधित प्राधिकारी के स्तर पर ही होगी।

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केंद्रीय नौकरी और राज्य के आरक्षण में अंतर

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। केंद्रीय ओबीसी सूची का इस्तेमाल केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्र से जुड़े आरक्षण प्रावधानों में किया जाता है। वहीं राज्य सरकार की नौकरियों और राज्य स्तर की आरक्षण व्यवस्था के लिए राज्य की आरक्षित सूची और राज्य के नियम लागू होते हैं। यही अंतर इस पूरे विवाद की जड़ में है। अगर किसी जाति का नाम केंद्रीय सूची में है, लेकिन राज्य की संबंधित सूची में नहीं है, तो केंद्रीय आरक्षण और राज्य आरक्षण के अधिकार को एक समान नहीं माना जा सकता।

क्या दूसरे राज्य से आकर स्थानीय चुनाव में आरक्षण का लाभ मिल सकता है?

यह सवाल सिर्फ लक्ष्मीपति राजू तक सीमित नहीं है। भिलाई-दुर्ग की राजनीति में दूसरे राज्यों से आकर लंबे समय से रह रहे कई लोगों की राजनीतिक सक्रियता है। ऐसे में आने वाले नगर निगम चुनाव में बाहरी राज्य से आए उम्मीदवारों और आरक्षित सीटों पर उनकी पात्रता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि व्यक्ति छत्तीसगढ़ में कितने वर्षों से रह रहा है। असली सवाल यह है कि आरक्षित वर्ग का लाभ लेने के लिए राज्य के कानून में कौन-कौन सी शर्तें निर्धारित हैं और संबंधित उम्मीदवार उन शर्तों को पूरा करता है या नहीं। यही जांच चुनाव के दौरान निर्णायक हो सकती है। आरक्षण की वजह से दूसरे वार्डों में जाने वालों के लिए भी कई सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

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अधिवक्ता रविशंकर सिंह ने क्या कहा?

इस विषय पर वरिष्ठ अधिवक्ता रविशंकर सिंह का कहना है कि आरक्षण से जुड़ी प्रक्रिया में नियम और कानून का पालन ही आधार होता है। उनके मुताबिक, जो व्यक्ति कानून और नियमों के दायरे में पात्र होगा, वही आरक्षित सीट से चुनाव लड़ सकेगा। लक्ष्मीपति राजू के मामले में उन्होंने कहा कि उनके पास जाति प्रमाण पत्र होने की बात सामने आई है, लेकिन प्रमाण पत्र की पूरी जानकारी और उसके आधार को देखने के बाद ही इस मामले में स्पष्ट राय दी जा सकती है।
यानी केवल प्रमाण पत्र का होना ही पूरी कहानी नहीं है। प्रमाण पत्र किस आधार पर जारी हुआ, उसमें कौन-सी जाति दर्ज है और उस जाति को संबंधित राज्य की आरक्षण व्यवस्था में क्या दर्जा प्राप्त है। इन सभी पहलुओं को देखने के बाद ही मैं कुछ बोल पाऊंगा।

कांग्रेस भी जल्दबाजी में नहीं

महापौर पद के लिए कांग्रेस के भीतर कई नामों की चर्चा है। लक्ष्मीपति राजू भी इनमें एक प्रमुख नाम हैं। लेकिन पार्टी स्तर पर टिकट को लेकर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। जाति प्रमाण पत्र और आरक्षण से जुड़े सवाल सामने आने के बाद पार्टी के लिए भी यह विषय संवेदनशील है। ऐसे में उम्मीदवार का नाम तय करने से पहले कानूनी और चुनावी पात्रता को पूरी तरह स्पष्ट करना जरूरी होगा। फिलहाल लक्ष्मीपति राजू अपनी दावेदारी को लेकर स्पष्ट हैं और उनके मुताबिक उनके पास एसडीएम द्वारा जारी प्रमाण पत्र मौजूद है।

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फैसला किसका होगा…

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि सूचनाजी.कॉम इस पड़ताल के आधार पर लक्ष्मीपति राजू को अपात्र घोषित नहीं कर रहा है। पड़ताल का उद्देश्य सिर्फ उस सवाल को सामने रखना है, जो भिलाई नगर निगम की ओबीसी आरक्षित महापौर सीट के संदर्भ में उठ रहा है। एक तरफ उम्मीदवार के पास राज्य के सक्षम अधिकारी द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र होने का दावा है। दूसरी तरफ संबंधित जाति की राज्य और केंद्रीय आरक्षण सूची में स्थिति को लेकर सवाल हैं।

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इसलिए अंतिम रूप से यह तय करना कि कोई उम्मीदवार आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के लिए पात्र है या नहीं, सक्षम चुनावी प्राधिकारी और लागू कानून-नियमों के आधार पर ही संभव होगा। भिलाई में महापौर की कुर्सी के लिए राजनीतिक मुकाबला शुरू होने से पहले जाति प्रमाण पत्र का यह सवाल कितना बड़ा मुद्दा बनता है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।

फिलहाल सवाल साफ है। कागज पर जाति प्रमाण पत्र है, लेकिन क्या वही प्रमाण पत्र भिलाई नगर निगम की ओबीसी आरक्षित महापौर सीट पर चुनाव लड़ने की पात्रता भी सुनिश्चित करता है?

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